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Sunday, 22 February 2015

अघोर और सांसारिक

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                                            अघोर से सांसारिक अपने सांसारिक सोच को समक्ष रख कर बाते करते हैं । कभी कोई साधक कहता है बंधन निवारण मन्त्र या विधि बता दो । कोई यंत्र उत्कीलन । कोई कहता है मन्त्र कैसे जागृत करते हैं यह बता दो । प्रेमी को सम्मोहन करने का मन्त्र बता दो । प्रेमिका को वश में करने का मन्त्र या उपाय बता दो । धन प्राप्ति का उपाय बता दो ।
                                              जब अघोर विधि से सोचता हूँ तो इतने मन्त्र अघोर तो याद रखते ही नहीं । जिस प्रकार आदेश हुआ या शक्तियों का सन्देश हुआ कार्य कर लेते हैं । अघोर के सारे क्रिया कलाप उलटे एवं साधारण विधि विधान से अलग होते हैं ।
                                           किसी देव को भोग देने की बात हुई खुद खा लिया । हवन में मदिरा पी के दाल दी । कहा ले लो भोग । कलवा को भोग देने की बात हुई अपने शिष्य को खिला दिया , शिष्य को भोग का असर भी नहीं हुआ और कलवा खुश हो गया । अलग अलग भाव अलग अलग प्रयोग । ऐसे प्रयोग कर पाने के लिए मन के भाव सम एवं स्वयं सक्षम होना होता है ।
                                      मुख्य यह है कि सांसारिक इन बातों को कैसे समझे । जब सांसारिक अघोर के पास समस्या लेकर आये तो पूर्ण श्रद्धा और समर्पण लेकर आये । दुविधा और दोहरी मानसिकता में अघोर के पास आओगे तो खुद परेशान होगे और अघोर के क्रोध भाव को भी झेलना पड़ेगा ।
                                   अघोर के प्रयोग शक्तियों द्वारा प्रेरित होते हैं ऐसे में अघोर के पास गए सांसारिक के बाधा निराकरण हेतु अलग अलग आदेश प्राप्त होते हैं । जिसमे कभी दुर्लभ वस्तुओं का प्रयोग निहित होता है कभी हवन ।अब उस प्रयोग में होने वाली विशिष्ट वस्तुओं को अघोर कहा से लेकर आएगा । ना धन का संग्रह करता है ना ही वस्तुओं का । ऐसे में वस्तु कौन लेकर आएगा ? या विशिष्ट हवन में धन कहा से लाएगा । किसी व्यथित सांसारिक का काम छोटे प्रयोग से हो जाता है किसी का बड़े कार्य के बाद ही संपन्न होता है ।
                                     सांसारिक को लगता है अघोर पैसे लेता है । कभी अघोर को महल में रहते देखा? कभी अघोर को मसान से बाहर रहते देखा ? मसान में धन से अघोर क्या करेगा ?
                                 अघोर ना ही कभी किसी किए सम्बन्ध तोड़ने का कार्य करेंगे ना ही वश में कर कोई कार्य कराने का । ऐसे में कुछ सीधा बोलते हैं पाखंडी हो नहीं हो तो काम करो मेरा । एक ने तो लिखा नफरत करती हूँ आप लोगों से । आप सब पैसे लेते हो । नहीं लेते तो मेरा प्रेमी जो मेरा फायदा उठा रहा है उसे वापस ला दो शादी करा दो ।अलग अलग बहाने अलग अलग मानसिकता । ऐसे में अघोर उनका स्वागत तो नहीं कर सकता । ना ही अघोर के संग रहने वाली शक्ति उससे प्रसन्न रहेगी ।
क्रोध भाव तो झेलना पड़ेगा ही ।।
अलख आदेश ।।।

अघोर वार्ता

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                           अघोर साधकों से बात करते समय संयम आवशक है । कई ऐसे महानुभाव हैं जो अघोर के निष्ठुर बर्ताव को नहीं समझ कर उनके विरुद्ध में बोलना शुरू कर देते हैं । अभी हाल में एक महानुभाव “मनु मेहता” महाशय ने कहा अगर शक्तियों का दम है तो सट्टे का नंबर बताओ , समझाने के प्रयास पे शुरू हो गए गाली गलौच करने । कुछ ऐसे भी हैं की मिलने आये और शुरू हो गए अपना पिटारा लेकर ये कर दो वो कर दो, ऐसा हुआ है वैसे कर दो वैसे हुआ तो ऐसे कर दो ।
                       इस बात से बेखबर होकर की एक अघोर साधक के कर्म, वाणी और सोच बस इष्ट के अनुसार ही चलते हैं । एक अघोर साधक खुद को बड़ा नहीं बताता है , अघोर साधक के सारे कर्म इष्ट के नियम और आदेश के अनुसार ही होते हैं ।अब शक्तियां हैं तो क्या सट्टे का नंबर पता करवाएं? या किसी प्रेमी प्रेमिका को मिलाने चल दें ?
                  सांसारिक एवं भौतिक प्राप्ति से अघोर को क्या लेना देना । उसे जो चाहिए वो तो वो पा ही लेगा । आवश्यक है आप क्या पाना चाहते हैं एक अघोर से ? स्वयं सक्षम बनना या सांसारिक सुख प्राप्त करना जो अत्यंत ही सूक्ष्म है । क्षण भंगुर तत्व की प्राप्ति तो आपके मृतप्राय देह के सामर्थ्य से संभव है । सांसारिक और भौतिक प्राप्ति से प्रमुख है स्वः को सक्षम बनाना ।
               सांसारिक उपलब्धि किस क्षण समाप्त हो जाए किसी को नहीं पता होता है । पर आध्यात्मिक उपलब्धि जन्मो जन्मो तक साथ चलती है । ऐसे बस कहना नहीं अटल सत्य है । आप के ज्ञान से अर्जित धन कुछ समय तक ही चल सकता है पर ज्ञान मृत्योपरांत भी आपसे जुड़ा रहता है ।
             प्रमुख है की स्वः सक्षम बने, इष्ट पर पूर्ण विश्वास और निःस्वार्थ प्रेम करें । इष्ट का स्वरुप एक माता के सामान होता है । जिसे अपने पुत्र के बोलने और सोचने से पहले पता होता है की पुत्र को क्या चाहिए । ऐसे में या तो आपके चाहने से पूर्व मातृ स्वरुप इष्ट सारी इक्षाएं पूर्ण कर देती है ।
            अब आप यह सोचो क्या बस जो शीघ्र लक्ष्य प्राप्त करना है या पूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति चाहिए क्षणिक इक्षा पूर्ण करनी है या सर्वोच्य इक्षा को पूर्ण करना है ?अघोर के पास जाओ तो आशीर्वाद मांगो, क्षमता मांगो, और इष्ट दर्शन की कामना करो । सांसारिक एवं क्षणिक वस्तुए मांगोगे तो वो अघोर को क्षण में क्रोधित करेगा । और कोप का भागी होना पड़ेगा ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-warta/ 

एक प्रार्थना सद्गुरुदेव से

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


एक प्रार्थना सद्गुरुदेव से -

हे सद्गुरुदेव हे मेरे जीवन के आधार
मेरे शरीर की आत्मा मेरे प्राणों के प्राणधार
मुझपे एक नजर कर दो
कुछ ऐसा अद्भुत असर कर दो
ना दिखे कोई जीव ना इंसान
बस दिखे आपका ही प्रकाश
जहा जाऊं बस आपको ही पाउ
जब ना दिखो आप तो संसार त्यागूँ
बस आपका चरण ही है मेरा संसार
हे सद्गुरुदेव बस इतना कर दो उपकार
ना दिखे मुझे आपके बिना कोई संसार
अलख आदेश ।।।
–मेहुल मकवाना
http://aadeshnathji.com/ek-prarthna/ 

सनातन धर्म की विडम्बना

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                                           क्या यही सनातन समाज है । जहां इष्ट की पूजा में चमत्कार का कोई स्थान नहीं था । और आज चमत्कार दिखाने वाले को भगवान् बना दिया जाता है । इष्ट का कोई महत्त्व नहीं है ? चमत्कार दिखा अनुयायी बन गए और लड़ने लगे उनके नाम पर । अपने गुरु को सबसे ऊपर दिखाने के क्रम में अंध श्रद्धा को बढ़ावा देते लोग । ज्ञान की क्या यही सनातन समाज है । जहां इष्ट की पूजा में चमत्कार का कोई स्थान नहीं था । और आज चमत्कार दिखाने वाले को भगवान् बना दिया जाता है । इष्ट का कोई महत्त्व नहीं है ? चमत्कार दिखा अनुयायी बन गए और लड़ने लगे उनके नाम पर । अपने गुरु को सबसे ऊपर दिखाने के क्रम में अंध श्रद्धा को बढ़ावा देते लोग । ज्ञान की बाते सुन के या पढ़ के ख़ुशी ख़ुशी प्रवचन करते गया लोग एवं स्वः में कुछ भी आत्मसात ना करते लोग । कहाँ गया हमारा सनातन धर्म । हर समय सनातन धर्म का डंका बजाते लोग । सनातन धर्म सबसे ऊपर बताते और कार्य तुच्छता का करते लोग ।बाते सुन के या पढ़ के ख़ुशी ख़ुशी प्रवचन करते गया लोग एवं स्वः में कुछ भी आत्मसात ना करते लोग । कहाँ गया हमारा सनातन धर्म । हर समय सनातन धर्म का डंका बजाते लोग । सनातन धर्म सबसे ऊपर बताते और कार्य तुच्छता का करते लोग ।

अघोर पंथ

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


क्या अघोर पंथ खतरों से भरा हुआ है?
                                      हाँ अघोर पंथ खतरों तथा अप्राकृतिक अनुभूतियों से भरा हुआ है ।  इस पंथ के साधक अक्सर विपरीत बुद्धि के होते हैं । जब मन में आया माँ को प्रेम किया कभी बेताली बोल दिया कभी पिशाचिनी बोल दिया । पर प्रेम ह्रदय से करते हैं । ना कोई छल ना कपट ना ही कोई इर्ष्य रखते हैं ।  साधारणतः साधक की इक्षा होती है माँ सौम्य रूप में दर्शन दे । पर अघोर पंथ के साधक माँ को प्रचंड रूप में ध्यान करते हैं । प्रचंड रूप की साधना में प्रचंड अनुभूति एवं अद्भुत विपरीत अनुभूति होती है ।
 
अघोर पंथ के साधक महामाया तथा महाकाल में रमे हुए होते हैं ।
 
                                अघोर पंथ की परीक्षा भी कठिन होती है । जो साधक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ वो सब कुछ पाया अन्यथा सब कुछ त्याग कर भूल गया ।अघोर उन साधकों के लिए कदापि नहीं है जो भय में साधना करते हैं । भैरव की साधना करते समय भय दूर करने के लिए हनुमान जी की फोटो जेब में रखते हैं कि अगर कोई भूत प्रेत आया तो हनुमान जी रक्षा करेंगे ।
                        रक्षा तो अवश्य होगी पर प्रेत राज क्रोधेश स्वयं रक्षा कर लेंगे । कुछ पाना है तो कुछ परेशानियों से गुजरना भी पड़ेगा ।आग का दरिया है डूब के जाना है।इस दरिया में डूबना तो है बस डूब जाना है। उस पार वही लगायेंगे । अगर खुद कोशिश की निकलने की तो प्रभु बैठ कर मुस्कुराएंगे  ।
अलख आदेश ।।।

अघोर सूत्र

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


काला निकाल कर लाल डालो
अंजरी बजरी सब खा लो
चार उंगल थी आठ उंगल फटी
तब नाथो के आगे नाठी ।।
अघोर साधक के लिए ये चार पंक्ति अति मूल्यवान हैं । साधना में अग्रसर होते हुए साधक के कर्तव्य अति तीक्ष्ण हो जाते हैं । थोडा स ध्यान भटका और बदनामी के गर्त में गिरे । कलिकाल के दौर में साधकों का मक्खन लगाने वाले संसारिकों से दूर रहना अति कठिन है । ऐसे कई गृहस्त साधक हैं जिनका प्रयास संसारिक प्रपंच से दूर रहना होता है ।
                                  परंतु कलिकाल के गर्त में सन्यासी साधक को भी सांसारिक मोह माया बांध लेती है । ऐसे में साधक क्या करे?
                            काले का अर्थ संसार के सभी विकार हैं और लाल पूण्य के घोतक । साधक के लिए आवश्यक है संसार में आने वाली हर चीजों को स्वीकारे चाहे वो भोज्य हो या अभोज्य, स्वीकार करने योग्य हो या नहीं । स्वीकार वो सबको करे पर जो ग्रहण के योग्य हो बस उसी को ग्रहण करे ।संसार में हैं तो संसार से विमुख होना आवश्यक नहीं है । संसार में मोह भी है माया भी है । लोभ भी है क्षोभ भी है । इन सबके साथ रह कर भी इनमे ना फसना साधक का कर्त्तव्य है । कमल के पत्ते पर जल की बूँद के सामान । कीचड में रहकर भी सुंदरता । यही साधक के लक्षण हैं ।
                                 साधना पथ से विचलित ना होना । समय के उंच नीच में सामान रहना ।साधारण मनुष्य चार आयाम तक सोच या देख सकते हैं । जब साधक सहज भाव से साधना में अग्रसर होता है तब उसके अष्ट आयामी दृष्टि कोण उसे महादेव प्रभु श्री आदिनाथ के सामने खड़ा करते हैं ।
                           अगर सांसारिकता के मोह ऐवम मायाजाल में फसे तो बस यहाँ की सुलभता पर ऐश कर सकते हैं और वाह वाही लूट सकते हैं । पर यह मनोरंजन और वाह वाही और सुलभता पल पल आपको वापस संसार में खींच रही होती है । शब्दों में ना कह पाएं और शब्दों को बदलने से मन के भाव नहीं बदल पाते । सांसारिक किसी महानुभाव के शब्दों की जयजयकार करते हैं । पर मन और कर्म के भाव की प्रमुखता महादेव के सामने खुल कर आती है ।
                             अपने कार्यों को संतुलित करें और मन के भाव को साधना पथ पर रखें । शब्दों का सूक्ष्मता से चयन करें । अन्यथा महामाया का अधो त्रिकोण रुपी परीक्षा तल इसी संसार के कर्मों में बाँध देगा ।।
अलख आदेश ।।।


Sunday, 15 February 2015

औघड़ वाणी

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


औघड़ वाणी: जब एक साधक मैं , मेरा , मुझसे और मैंने को आत्मा तथा सर्व रूप से त्याग कर बस महामाया के द्वारा, महामाया ने , महामाया का एवं बस महामाया को आत्मसात कर लेता है तब वह सबको सम भाव से देखता हुआ महामाया के प्रेम का पात्र बन जाता है ।
अन्यथा कई लोग के वचन होते हैं मैं यह कर सकता हूँ वो कर सकता हूँ । पर करने और कराने वाली तो बस वही महामाया है ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-wani1/ 

औघड़ वाणी

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


औघड़ वाणी : संतो की प्रवृति सम होती है । कोई शत्रु नहीं होता । शत्रुता के लिए कोई स्थान नहीं होता। मनुष्य ही बस कृपा पात्र नही होते । अपितु पशु पक्षी जीव सभी से प्रेम होता है ।
संतो की पहचान बस भगवे से या तिलक से नहीं होती ।
संत सान्निध्य में श्वान मुस्कुराते हैं । गाय सर झुका देती हैं । पक्षी उनके पास आ चह चहाते हैं ।
मूसक उनके ऊपर कूदते हैं । नाग बिना फुन्फ्कारे देखते रहते हैं । जो खाते हैं सबको देते हैं । स्थान की पवित्रता अपवित्रता का भान नहीं होता।
इसलिए कहते हैं संत विरले ही मिलते हैं और संत सान्निध्य कृपा से ही मिलता है ।
“अब मोहि बा भरोस हनुमंता बिनु हरी कृपा मिलही नहीं संता”
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-wani2/ 

सृष्टि एक भ्रम

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                 श्रृष्टि की रचना का उद्देश्य क्या है यह तो ज्ञात नहीं । पर अगर तर्कानुसार सोचता हूँ तो कभी ऐसा प्रतीत होता है जैसे महाकाल महादेव एक ऐसे मनुष्य जिन्होंने परम अवस्था को सर्वप्रथम प्राप्त कर लिया । परम अवस्था को प्राप्त देव स्वरूपी परब्रम्ह हो गए समयानुसार दर्शन दे कर सबको ज्ञान और भक्ति का मार्ग दर्शन दिया ।
                              कभी लगता है कि हम सब महामाया और महादेव के क्रीडा स्थल पर खेल रहे हैं । जैसे umpier के हाथ ने points देने की क्षमता हो । बस उनका खेल हम खेलें और जिसका खेल उत्तम लगा उसे points मिल गए । नियम भी उन्ही के खेल भी उन्ही का कानून भी उन्ही के । हम खेल में तल्लीन हो खेले जा रहे हैं ।
सब कुछ महामाया के हाथ में कैसे है यह तो स्वयं किसी भी कार्य में समझ सकते हैं । आप कोई भी कार्य करें पर अंत में क्या फल होगा यह भी नहीं पता होता । क्या पता काम ही ना बने । क्या पता काम रुक जाये और क्या पता सोची समझी हुई कार्य प्रणाली काम ही ना करे ।
                                 पर जहाँ तक मुझे लगता है भगवान् का एक रूप हमारे अंदर भी है । जिसे जागृत करने से अपनी इक्षा के अनुसार कार्य किया जा सकता है । जब स्वयं का ब्रम्ह जागृत हो जाये तो महामाया भी उस कार्य में बाधा नहीं उत्पन्न कर पाती है । अन्यथा रावन सबसे महान था । उसे भूत भविष्य और वर्तमान ज्ञात था तो दंभ क्यों करता और मृत्यु को प्राप्त करता । शास्त्रों में भी कहा गया है स्वयं के ब्रम्ह को जागृत करो ।
इसिलए शास्त्रों में स्वयं को जागृत करने और नियंत्रित करने की बात कही गयी है । कार्य करो पर स्वयं को ब्रम्ह बना कर साधारण मनुष्य की तरह ही रहो । विदेह होने की उत्तम प्रणाली है ।
अलख ।।।

साधक और प्रेमी

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 

साधक और प्रेमी में अधिक अंतर नहीं होता
साधक माँ से बात करते हुए जगता प्रेमी प्रेमिका से बात करते हुए ।
साधक माँ के रूप को सोचता रहता है प्रेमी प्रेमिका के चित्र को ।
साधक रात्रि जागरण माँ के लिए करता है प्रेमी प्रेमिका को प्रसन्न करने के लिए ।
साधक स्वयं को जानने के लिए तत्पर होता है प्रेमी प्रेमिका के प्रेम के लिए ।
अंतर दोनों में बस क्षण भंगुर और परम की प्राप्ति की होता है ।
प्रेमी मिटटी स्वरुप देह को पाकर खुश होता है साधक परम तत्त्व की प्राप्ति कर प्रसन्न रहता है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/sadhak-aur-premi/ 

औघड़ वाणी

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


औघड़ वाणी : मनुष्य किसी साधक में एक अलोकिक प्रकाश देखते हैं । प्रकाश पुंज को खोजते हुए जब प्रकाश पुंज की ओर अग्रसर होते हैं । जब प्रकाश की ओर बढ़ते हैं । तब प्रकाश पुंज तेज होता जाता है संग में उस प्रकाश की ऊष्मा भी तेज होती है । शरीर का तेज एवं ऊष्मा में भी वृद्धि होती है । जब प्रकाश पुंज के निकट होते हैं तब शरीर से भी तेज निकलता है ऊष्मा निकलती है प्रकाश निकलता है । अगर साधक उस समय इस भान में रहे कि तेज, ऊष्मा या प्रकाश उससे प्रवाहित हो रहा है तो भटक जाता है ।
इस बात को भूल जाता है कि प्रकाश परम पुंज से निकल कर उससे मात्र प्रवाहित हो रहा है। कुछ साधक प्रकाश पुंज तक पहुँचने से पहले ही बैठ कर अपने आप को परम समझने लगते हैं ।
अपितु परम तो कुछ और दूरी पर है ।
जो साधक परम तक पंहुचा और परम प्रकाश पुंज में समाहित हो गया वह उसी में लीन हो गया ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aughad-waani4/ 

प्रभु श्री आदेश नाथ जी के अनुपम वचन

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

मेरे गुरुदेव प्रभु श्री आदेश नाथ जी के अनुपम वचन :
                                   सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में एक अच्छी बात थी कि उस समय मनुष्य , देव एवं दानव की वेश भूषा , वार्ता , रहन सहन अलग थी ।देव सुन्दर स्वच्छ आभूषण युक्त एवं संस्कृत बोलते थे । सभी से प्रेम तथा कृपा करते थे । देव सत्कर्म में लीन रहते थे ।मनुष्य साधारण क्रियाकलापों को करते और हिंदी बोलते थे । सांसारिक कृत्य कर परमेश्वर की उपासना करते थे ।
                                दानव गंदे एवं मांस मदिरा पी कर उद्धम मचाते थे । अपशब्द बोलते थे । मनुष्य तथा देवों को परेशान करते थे।जब कलिकाल का पदार्पण हुआ तब सब एक सम हो गए । सबकी वेश भूषा व्यवहार तथा वार्ता एक सामान हो गयी । अंतर कर पाना मुश्किल हो गया ।सब एक साथ रहने लगे । देव मनुष्य और दानव के भाव ही इस पृथ्वी पर रह गए ।
                                 पर मनुष्य की बुद्धि जीवित है । देव मनुष्य और दानव में भेद उनके कार्य कलापों से ज्ञात किया जा सकता है । पर व्यवहार तथा भेद जानने के लिए थोडा परिश्रम करना पड़ेगा । भाव तथा क्रिया कलापों से ही जाना जा सकता है कि कौन देव है कौन मनुष्य और कौन दानव ।
जय गुरुदेव ।।। श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश आदेश आदेश ।।
अलख आदेश ।।।

श्री रमेश भाई ओझा के अनुपम शब्द


                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


पूज्य श्री रमेश भाई ओझा के अनुपम शब्द :
                                         एक कारागार में राष्ट्रपति महोदय निरिक्षण करने गए । सभी कैदियों से उनकी व्यथा पूछी । किसी ने कहा दीवाल पुतवा दो । किसी ने कम्बल की मांग की । किसी ने लेखन सामग्री की मांग की । पर किसी चतुर कैदी ने प्रार्थना की “यहाँ से निकाल दो अब ऐसी गलती दुबारा नहीं करूँगा । सभ्य नागरिक की तरह जीवन निर्वाह करूँगा । ” उसे कारागार से मुक्ति मिल गयी ।
                                         हम सांसारिक भी ऐसा ही कुछ करते हैं । जब इश्वर के सामने आते हैं तो घर , संसार, क्षणिक सुख के लिए अरज लगाते हैं । जब परम परमेश्वर सब कुछ देने के भाव में आते हैं तो क्षणिक सुख सुविधा मांग कर अपनी इक्षा को छोटा कर लेते हैं । जब माँगना है तो कुछ ऐसा मांगे जो जीवन सफल बना दे । जीवन के बाद का जीवन सुखमय बन जाए । प्रसन्नता कुछ समय के लिए हो तो क्या लाभ ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/ramesh-bhai-ojha/ 

औघड़ वाणी

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                                औघड़ वाणी : इक साधक का जीवन अति कठिन होता है । वाणी , रहन सहन , भाव – भंगिमा , जीवन शैली आदर्शों के एक पतली सी रस्सी पर चलने के समान होता है । इसी पर चलते जाना है जब तक स्वयं महामाया अपनी गोद में ना उठा ले । जब तक स्व से परम ना बन जाएँ ।
                               अन्यथा थोड़ी सी भी चूक बदनामी के अँधेरी घाटी में गिरा देता है । ऐसा बस साधक के संग नहीं होता अपितु वह अपने आराध्य एवं पंथ की छवि को भी ठेस पहुचाता है । तथा श्रद्धा रखने वाले शिष्य एवं मनुष्य की श्रद्धा को भी हानि पहुचाता है । अतः साधना पथ पर उन्नति प्राप्त कर चुके साधक की वाणी और कर्म सम भाव में ना हों तो उसके संग इष्ट , मनुष्य की श्रद्धा एवं भक्ति भी हानि सहन करती है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aughad-waani5/ 

महाकाली प्रचंड है पर राक्षसी नहीं

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                                     महामाया महाकाली प्रचंड है पर राक्षसी नहीं । भैरव क्रोधेश हैं भूतपति हैं पर शैतान या राक्षस नहीं हैं । आज कल हिन्दू धर्म के पतन के लिए चित्रकार रुपी महानुभावों ने अजीब अजीब चित्रें बना कर सबके सामने प्रस्तुत कर दी हैं । जिन लोगों को सत्यता का भान नहीं वो उन्ही चित्रों के माध्यम से मात्रि स्वरूपी महामाया की विपरीत रूप वाली छवि की साधना करते हैं या भयभीत हो सभी को भयभीत कराते हैं ।
                                    महामाया का प्रचंड रूप अपनी संतान की रक्षा करने के लिए होता है । इस संसार में भी अगर आप किसी स्त्री की संतान को हानि करने की कोशिश करते हैं । एक अबला स्त्री प्रचंड रूप लेकर अहित करने वाले शक्तिशाली पुरुष से भी लड़ जाती है । किसी भी मात्रि स्वरुप चाहे वो श्वान प्रजाति की हो या बन्दर प्रजाति की । हर रूप में माँ अपने संतानों के लिए प्रचंड भाव रक्षा हेतु रखती है ।
                                        महामाया के हस्त कमलों में अस्त्र शस्त्र हैं पर वे सभी सुप्तावस्था में होते हैं । माँ के हाथों ने वर एवं अभय का भाव सर्वोपरी है । जिससे माँ अपने अभय मुद्रा से गोद में उठा वर मुद्रा हस्त से अपने संतान एवं अंश के सर में हाथ फेरती हैं । और मनुष्य के शत्रु (क्रोध , मोह, क्षोभ इत्यादि) को अपने शस्त्रो से काट देती हैं । माँ के अति प्रचंड रुपी स्वरुप में अभय और वर मुद्रा स्पष्ट रूप से दिखता है । जिनको माँ की आखों में डर की अनुभूति होती है । वो उग्र रूप में प्रचंड हुई स्त्री के आँखों का स्मरण कर लें । उस स्त्री की आँखें भी रक्तिम एवं क्रोध से परिपूर्ण होती हैं । प्रचंड रुपी स्वरुप में अगर माँ के मुख को देखा जाये तो माँ हसती हुई प्रतीत होती है जो सभी प्रकार के डर भय के भाव को नष्ट करने की क्षमता रखता है ।
अलख आदेश ।।।

आत्मा – शरीर


                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश



                                      एक आत्मा शरीर त्यागने के बाद शारीरिक मोह माया बंधन एवं इक्षा से निवृत नहीं हो पाती ।ऐसी बंधन युक्त आत्माएं प्रेत , भूत, राक्षस, एवं पिशाच का रूप अपनी आकाँक्षाओं के अनुसार करती हैं । एक अघोर साधक इनका उपासक नहीं होता । मसान में साधना कर रहे अघोरी के पास आत्माएं आकर अपने मुक्ति का आग्रह करती हैं । अघोर महामाया के निर्देशानुसार उन आत्माओं से इक्षित कार्य करवा उसके बन्धनों से मुक्त कर उसे मुक्ति प्रदान करवाता है ।
                                       अघोर प्रेतों और भूतो को वश में नहीं करके रखता और ना ही सांसारिक उपलब्धियों के लिए इस्तेमाल करता है । आग्रह कर रही आत्माएं अपनी इक्षा के अनुसार साधक के साधन की पूर्ति करती हैं । अघोर प्रेतों से कोई वचन की अपेक्षा नहीं रखता है । जब अघोर स्वयं भैरव से प्रत्यक्ष वार्ता कर सके तो भूत प्रेतसे क्या मिन्नत करे ।
अलख आदेश ।।।

Saturday, 14 February 2015

औघड़ वाणी

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 

                                          मनुष्य अपने क्रिया कलापों को कितना भी बढा चढ़ा कर या महिमा मंडन कर दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दे । चाहे कितनी भी प्रसिद्दि पा ले । पर आत्म रूपी आत्मा से कभी मिथ्या नहीं कह सकता । स्वयं की आत्मा रुपी परम अंश को मनुष्य की हर गति विधि का ज्ञान होता है । पर कुछ ऐसे महानुभाव जो मिथ्या में पूर्णतः लिप्त हैं वो स्वयं को भी झूठ बोल कर भ्रमित कर देते हैं । ऐसे में भ्रमित और उत्कंठित आत्मा अंत में मृत्यु शय्या पर इन सबका बोध कराती है ।
अलख आदेश ।।।

Friday, 13 February 2015

अघोर साधक

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                                        सच्चा साधक एक स्वर्ण के पिंड के सामान होता है । जिसे गुरु खोज कर पात्र बनाते हैं । जिसमे गुरु उसे तपाते हैं पीटते हैं । पात्र के रूप में ढाल देते हैं । उस पात्र में अपन ज्ञान का अमृत उड़ेल देते हैं । पर उस पात्र की साफ़ सफाई और रख रखाव साधक के हाथ में होता है । साफ़ करके गन्दगी हटा देना आसान है पर कठिन है उसको चमकाना ।चमकाने की प्रक्रिया कठिन परिश्रम और लगन से पूर्ण होती है । अंत में चमकता हुआ पात्र श्रद्धा का विषय बन जाता है ।
                                अक्सर सब कहते हैं जब संतो के संग होता हूँ मन शुद्ध है और जब संसार में आता हूँ सारी बातें भूल कर संसारिकता में लिप्त हो जाता हूँ । ऐसे में ज्ञान को आत्मसात करने की क्षमता की कमी दर्शाती है । संत यह नहीं कहते कि संसार में संत बनके दिखाओ । संत के ज्ञान को आत्मसात कर अपने क्रिया कलापों में निवेशित करो ।क्रोध लोभ मोह माया तो अवश्यम्भावी है पर उनको दूसरी दिशा में भटकना होगा । इसके उपरान्त जनित भाव स्वयं ही उस दिशा में भटक जायेगा ।
अलख आदेश ।।।

क्षोभ और संसार

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 

                                  क्षोभ शायद मनुष्य जीवन का हिस्सा बन गया है । सांसारिक को संसार में रहने का क्षोभ , मनुष्य को मनुष्य योनि में आने का क्षोभ , सन्यासी को संन्यास में होने का क्षोभ , पुत्र को पिता से क्षोभ , पिता को पुत्र से क्षोभ । जो मिला उससे क्षोभ जो ना मिला उसका क्षोभ ।
                                  हे साधक जो मिला उससे प्रसन्न रहो । जैसे मिला या मिलेगा वह महामाया का प्रसाद है । प्रसाद समझ के ग्रहण करो । प्रसाद हमेशा सर्वोत्तम ही होता है । बहाने न खोजो कि यह ऐसे ख़राब है वो वैसे ख़राब है । शरीर है तो शरीर से प्रेम करो त्याग कर परम बनने की चाह में इस शरीर को निरर्थक ना समझो । मात्रि कष्ट के चरम सीमा से प्राप्त हुए इस शरीर से ही यह ज्ञान, बात करने और सोचने की क्षमता प्राप्त हुई है । महामाया के परम रूप को जानने का अवसर मिला है । तो अब इससे ही घृणा क्यों?
                               जब तक है प्रेम करो और विदेह बनने का प्रयास करो । जब शरीर से आत्मा का प्रस्थान हो जायेगा तो परम बनने का प्रयास करना । शायद क्षोभ में ही क्षोभ को परिभाषित किया जा सकता है । शायद इसिलिए क्षोभ करने वाले मनुष्य पर मेरा क्षोभ ।।
अलख आदेश ।।।

सिद्धि का अर्थ

                              ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश 


                             सिद्धि का अर्थ किसी भी प्रयास का फल है । चाहे वो एक नौकरी पेशा व्यक्ति का महीने के अंत में मिलने वाली तनख्वाह । या किसी साधक का साधना में सफलता । अलग अलग रूप हैं ।सांसारिक ने कहा धन की यथोचित समृद्धि । ज्ञानी ने कहा आत्म ज्ञान । साधक ने कहा इष्ट की प्राप्ति ।
                            जब मैंने अपने गुरुदेव से चर्चा की उन्होंने कहा सिद्धि कुछ नहीं है बस पड़ाव है किसी भी पथ पे चलने वाले पथिक का । सिद्धि किसी भी साधक को सही पथ पे चलने का मार्ग दर्शन है ।

धन की प्राप्ति : धन क्षणिक है सांसारिक भोग विलास के कार्य आने वाला एवं सुलभता हेतु एक मार्ग । आवश्यक पर परम आवश्यक नहीं ।

आत्म ज्ञान : स्वयं का ज्ञान सबको है । सभी को पता है कि मैं क्या कर सकता हूँ । क्या नहीं कर सकता वो बस भ्रम है । जो नहीं किया जा सका उसके कार्य में कुछ कमी है । अगर मैं शिवांश काली का पुत्र और काली पुत्र भैरव का प्रिय हूँ तो जिस रूप में माँ को प्रेम से बुलाऊंगा या जिस प्रकार माँ को पुजुंगा माँ स्वीकारेगी । यह आत्म विश्वास है दंभ नहीं । माँ के प्रति प्रेम है । जो खाऊंगा माँ को वही भोग लगाऊंगा । माँ वही ग्रहण करेगी । जो कार्य करूँगा माँ उस कार्य में सहयोग करेगी एवं हर संभव विधि से रक्षा करेगी ।

इष्ट की प्राप्ति : हर जीव में माँ का अंश है । माँ कोई भी रूप लेकर सामने आ जाएगी । किस विधि से सामने आएगी क्या बोलेगी क्या कराएगी सब उनकी माया है । किस रूप में आवाज देगी यह समझना साधक का कार्य है । जिस रूप में पूजें क्या वही रूप आएगा बात करने ? माँ को पूजा दस भुज रूप में माँ आई दो भुजी । सब माया है । परम तो बस शून्य है । शून्य का कोई रूप नहीं । रूप है तो फिर अनेक ।
                                    सिद्धि फलित तब जब परमेश्वर का अहसास हमेशा हो । काली पुत्र का संग हमेशा रहे । प्रेम से सरोबार जब क्रोध लोभ मोह के बंधन का अहसास ना हो । हर जीव माँ के रूप में मुस्कुराये ।
अलख आदेश ।।।