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Wednesday, 28 January 2015

क्षोभ और संसार

क्षोभ शायद मनुष्य जीवन का हिस्सा बन गया है । सांसारिक को संसार में रहने का क्षोभ , मनुष्य को मनुष्य योनि में आने का क्षोभ , सन्यासी को संन्यास में होने का क्षोभ , पुत्र को पिता से क्षोभ , पिता को पुत्र से क्षोभ । जो मिला उससे क्षोभ जो ना मिला उसका क्षोभ ।
हे साधक जो मिला उससे प्रसन्न रहो । जैसे मिला या मिलेगा वह महामाया का प्रसाद है । प्रसाद समझ के ग्रहण करो । प्रसाद हमेशा सर्वोत्तम ही होता है । बहाने न खोजो कि यह ऐसे ख़राब है वो वैसे ख़राब है । शरीर है तो शरीर से प्रेम करो त्याग कर परम बनने की चाह में इस शरीर को निरर्थक ना समझो । मात्रि कष्ट के चरम सीमा से प्राप्त हुए इस शरीर से ही यह ज्ञान, बात करने और सोचने की क्षमता प्राप्त हुई है । महामाया के परम रूप को जानने का अवसर मिला है । तो अब इससे ही घृणा क्यों?
जब तक है प्रेम करो और विदेह बनने का प्रयास करो । जब शरीर से आत्मा का प्रस्थान हो जायेगा तो परम बनने का प्रयास करना । शायद क्षोभ में ही क्षोभ को परिभाषित किया जा सकता है । शायद इसिलिए क्षोभ करने वाले मनुष्य पर मेरा क्षोभ ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/kshobh-aur-sansar
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Wednesday, 21 January 2015

औघड़ वाणी- Aughad waani

भूत वर्तमान और भविष्य जीवन के स्तम्भ हैं । पर वर्तमान है कहाँ? अभी जो पढ़ा या किया वो भूत में चला गया और जो पढने वाले हो वो भविष्य है । पग बढाया वो भूत जो बढाने वाले हो भविष्य ।
वर्तमान का सन्दर्भ किस तथ्य पर सुशोभित होता है ।
वर्तमान शायद एक त्रिकोण के उस जोड़ के सामान है जो बिंदु से भी छोटा है । एक रेखा भविष्य है एक भूत । जो व्यक्ति उस वर्तमान में स्थिर हो गया वो कभी बदला ही नहीं । ऐसी अपेक्षा बस एक साधक से की जा सकती है जो परम हो गया ।
ना भूतकाल उसे अपने में समाहित कर पायेगा ना ही भविष्य की चिंता उसे परेशान कर पायेगी ।
जिसके शरीर को कभी क्षति नहीं पहुचेगी ना ही उसका मन कभी विचलित होगा ।
शायद परम परमात्मा उस वर्तमान रुपी अति सूक्ष्म जोड़ पर विराजमान हो भूत और भविष्य को नियोजित रूप से चला रहे हैं । एक साधक की परम गति तब होगी जब वह भी उस वर्तमान रुपी जोड़ पर प्रभु से लीन हो जाये ।
साधक का मुख्य कार्य गहन से गहन रूप की व्याख्या समझनी होती है । उत्सुकता और गहन अध्ययन किसी भी रूप की वर्तमान रुपी अति सूक्ष्म जोड़ को समझने की गति प्रदान करता है ।
अन्यथा जो भूत और भविष्य के ऊपर घूमता रहा वो उसी उधेड़बुन में भविष्य रुपी काल और भूत रुपी गत में फस गया ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-waani-8/