Showing posts with label aghor panth. Show all posts
Showing posts with label aghor panth. Show all posts

Friday, 27 February 2015

औघड़ वाणी

औघड़ वाणी:  अगर संन्यास के बाद भी भौतिक मोह व्याप्त है और सांसारिक प्रतिष्ठा की भूख है तो संन्यास का कोई मायने नहीं है । हर साधक के कर्म पूर्व निर्देशित होते हैं । दिखावे का चोला और दिखावे का संन्यास क्षणिक है ।
कुछ सन्यासी कहते हैं अकेले में क्या किया जाए ?
अकेलापन और संसार से दूर अगर रहने का निर्णय कर संन्यास लिया गया है तो मन को संयमित कर बाँध कर अगर इष्ट में रमन करना प्रमुख है । अन्यथा समाधी के बाद भी आत्मा इसी चक्कर में भटकती रहेगी ।

अलख आदेश ।।।

Tuesday, 10 February 2015

अघोर साधना

                                
                                      ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                             अघोर साधक को कुछ भी पाने के लिए कठिन से कठिन एवं अति उग्र अनुभूतियों से गुजर कर ही कुछ पाना होगा । वीर मार्गी साधना में अनुभूतियाँ भी अति उग्र होती हैं। मस्तिस्क की जागृत अवस्था और अर्ध सुप्तावस्था में द्वन्द होता है । जब तक जागृत मस्तिस्क कार्य करेगा अर्द्ध सुप्त मस्तिस्क (जो साधना के बल पर जागृत होता है ) नहीं जागेगा ।
                                                     कई अनुभूतियों में शरीर का विलीन होना एवं जल में डूबने के समान अनुभूति होती है । शक्तियां अलग अलग रूप से अनुभूति प्रदान करती हैं । जो साधक की साधनाओं का पथ प्रदर्शन करती हैं । किसी को नाग की अनुभूति , सर्प से जकड़ने की अनुभूति , कहीं ऊँचाई से गिरने की अनुभूति । वीर साधना अनेकानेक अनुभूतियों का भण्डार है । पर अनुभूतियों में आवश्यक है जागृत अवस्था को खोने देना । साधक अक्सर उन अनुभूतियों में भय वश जागृत अवस्था में आने के लिए छटपटाने लगते हैं । यह तो बस अर्द्ध सुप्तावस्था है । इन अनुभूतियों के पश्चात ही शक्ति का आगमन है ।
                                                          शुरुआत में भय तो होता ही है । चाहे आप मसान में पहली बार जाओ या किसी शक्ति के आलिंगन में । उस भय को किनारे कर इष्ट एवं गुरु पर पूर्ण विश्वास रख कर कि कुछ नहीं होगा । करवाने और देखने वाले देख रहे हैं सब उन पर छोड़ कर आगे बढ़ना ही साधना में उन्नति का मार्ग प्रशस्त करना है ।
                                                           पर कुछ साधक इन परीक्षाओं से बिना गुजरे सब कुछ पाना चाहते हैं । पिछली पोस्ट के बाद एक महानुभाव ने कहा ,” मुझे कलवा चाहिए ।”

क्या शक्तियां ऐसे ही मिल जाती हैं ?? क्या कलवा कोई हलवा है जो उठाया और दे दिया ??

                                                    किसी भी शक्ति को धारण करने से पूर्व साधक को सक्षम होना होता है । अगर साधक सक्षम ना हुआ तो शक्ति साधक का अनिष्ट कर चली जायेगी । अगर जलता हुआ अंगार हाथों पे उठाना है तो हाथ को लौह का बनना होगा ।सर्वोपरि है गुरु मन्त्र जो आपको सक्षम बनाता है । उसके उपरान्त साधनाएं शुरू होती हैं ।अन्यथा किसी भी साधना की शुरुआत हानि कारक है ।
                                                       साधना करें और किसी भी शक्ति को पानी की लालसा ह्रदय में कदापि ना रखें । जब शक्तियों को आपकी क्षमता का दर्शन होगा और स्वार्थ रहित विचार एवं साधना होगी तो शक्तियों का साथ निरंतर एवं हर क्षण रहेगा ।
अलख आदेश ।।

Monday, 9 February 2015

औघड़ वाणी

                                      ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                          
                                               औघड़ वाणी : अघोर की आकांक्षा रखे साधक का भटकाव होना अवश्यम्भावी है । जब तक भटकाव नहीं होगा तब तक महामाया की माया समझ नहीं आएगी । भटको अवश्य भटको पर भटकने के बाद अपने गंतव्य को समझने का प्रयास करो । भटकाव को समझने के लिए आवशक है ग्रहण मुद्रा । शक्ति को पाने के बाद उसी में रमने और प्रदर्शन से पहले आवश्यक है ग्रहण मुद्रा को समक्ष रखना । अगर ग्रहण मुद्रा में ना रहे तो स्वः प्राथमिकता ले लेगा ।
                                             अक्सर नए साधको को देखता हूँ अघोर में आये और स्वयं को अघोरी और औघड़ बताने लगे । अघोरी और औघड़ की परिभाषा कहीं ऊँची है । कुछ कहते हैं मुझे भय नहीं लगता कहीं भी बिठा दो । दंभ भाव में जब उनको अघोरानुभुती होती है तो फिर गुरु पर सवाल उठाने लगते है ।
हमारे सदगुरुदेव का वचन है जो गुरु कहे वो करो जो करे वो कदापि ना करो । उनकी शक्ति और सामर्थ्य कहीं ऊँचा है । उनकी एक ताली से मसान भयंकर रूप लेकर समक्ष आ जाता है ।

                                                  और जब नए साधक अपने आपको समर्थ समझ मसान को गुरु के ही तरह से जगाने का प्रयास करते हैं तब कुछ हासिल नहीं होता है । अगर कोई उन्हें कुछ बताये तो स्वः को समर्थ समझ उनसे भिड जाते हैं ।गुरु पराकाष्ठा पर विराजित होकर भी जब सीखने का मौका मिलता है सीखने का प्रयास करते हैं ।  तो उनके इसी भाव को समक्ष रख कर इसी भाव से ग्रहण मुद्रा को प्राथमिकता दें । जीवन और शरीर नश्वर है । आत्मा इसी ज्ञान और स्वः को समझ कर शिव के समक्ष जाती है और त्रुटी होने पर वापस जन्म लेती है ।
अलख आदेश ।।।




औघड़ वाणी

ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                              औघड़ वाणी : अघोर पंथ की वास्तविकता से परिचय कराना गुरु का कार्य है । गुरु हर संभव जटिलताओं से साधक का परिचय कराते हैं । नए साधकों के प्रश्न जिसमे मैं अघोर मार्ग के कठिन स्वरुप को भयभीत करने के उद्देश्य से लिख रहा हूँ ऐसा कतई नहीं है । मैं तो गुरु आज्ञा से अघोर पंथ के वास्तविक रूप को सभी के सामने रख रहा हूँ । इससे भयभीत होना या प्रेम होना आपका दायित्व है ।
                                              आपकी इक्षा पर पुर्णतः निर्भर करता है । अघोर सहज है और मनुष्य जीवन काल को समाप्त करता हुआ जटिलता की और बढ़ता रहता है । जटिलता से वापस सहजता की ओर अग्रसर होना अत्यधिक कठिन है ।
                                              अघोर में भय का कोई स्थान नहीं है । अगर भयभीत हुए तो कुछ समय की और प्रतीक्षा कर लें । अक्सर देखा गया है । अभी कुछ देखा या सुना या पढ़ा मन लालायित हो जाता है उस कार्य को करने के लिए । ऐसा अघोर पंथ में प्रवेश हेतु कतई ना करें । पढ़ते रहें समझते रहें एवं अघोर को जानते रहें । जब स्वः गुरु आत्मा का आदेश हो जाये कि अघोर पूर्णतः आपके लिए ही है तब प्रवेश लें या अघोर साधनाओं की ओर अग्रसर हों ।

अलख आदेश ।।।


http://aadeshnathji.com/aughad-waani-14/ 

अघोर मार्ग

                                         ॐ सत नमो आदेश श्री नाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश         
                                               
                                                      अघोर पंथ दुष्कर मार्ग है । इस दुर्गम और कष्टदायी मार्ग पे चलने वाले साधक हर क्षण इष्ट के भाव में रहते हैं और हर क्षण किसी ना किसी प्रयोग का दुष्प्रभाव सहन कर रहे होते हैं । अगर आप अघोर साधनाए कर रहे हो और कोई दूसरा साधक आपको देखता है तो आपसे प्रत्यक्ष वार्ता ना करे तो अपनी शक्तियों के माध्यम से आपके बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहेगा । आपकी शक्तियों का अवलोकन करना चाहेगा । ऐसे में नए साधको के पास गुरु रुपी रक्षा कवच ना हो तो कई परेशानियां सामने आ जाती हैं ।
इष्ट के भाव में रमे हुए साधक अपनी मर्जी से कार्य करते हैं । इसीलिए सामान्य सांसारिक उन्हें पागल या विछिप्त भी मान लेते हैं ।
अघोर साधनाओं के गुप्त होने का यह भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है ।
अलख आदेश ।।।


http://aadeshnathji.com/aghor-marg/ 

 

Sunday, 8 February 2015

Death & Salvation


ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश


Death & Salvation

What is death?
Just a physical phenomenon! Termination of life functions of the body, quietuses of all vital signs, liberation of soul from worldly worries? Death is a landmark move towards the next stage to salvation.
Our guru says when death approaches, at the deathbed; a person faces numerous physical, social and terrestrial disturbances, chaos, tangles, pain. The body squirms with distress due to various unfulfilled wishes, infatuations, enticements, and temptations. It creates obstacles in attaining a peaceful death. It transfers the entire process of passing into an extremely traumatic experience.
When all of the materialistic, sensual and congenial desires ceased than only one gets ready to be absorbed into almighty. And that is a real death leading to salvation. To be more precious: Moksha.
After death, all the terrestrial bonds are suspended. He can move freely like air. He becomes fearless without malice or malevolence. With termination of life all the lively ups and downs, fluctuations are ended.    But does the soul also become free of all the chaos and clutter? If the soul too gets free thanit will never reincarnates.  The religious doctrine of souls surviving the physical death and return in new bodies.
Chaos and commotions are integrated to human body. If one realizes it and gets his soul free from all the mess than only one can attain salvation, else one engulfs in persistent cycle of life and death.
The true worth of this life is rarely realized. Life is evanescent. The soul is wrapped in flashy attire. No one knows when death arrives, terminating the very existence.
Have you noticed how the pyre on funeral burns each layer of our body and turns it into ashes within few hours? But what if the body too turns divine? If the body too turns sacred, sanctified like soul than no weapons can harm it, no fire can burn it, no air can dry it or water can sink it.
When does a Sadak die?
If Sadak is dead than how can he was aSadak? Guru Dev explainsthat the AghorSadak dies due to fault, error or imperfection while performing rituals. Otherwise, he will never die!  It's not just a statement; it is the future guidance for unyielding commitment for rituals. It means if one quits all the carnal enticements and temptations;soul is freed from attachments to attain salvation. If salvation is attained in life where is the need of death?
A person has three types of terrestrial life: physical, subtle and celestial. When the desire of physical pleasure and comforts ends eternally and entirely than the odyssey towards salvation is initiated.  He transforms into the subtle state of life.  The life becomes immortal, ready to attain salvation, attaining divinity.
Various Aghoris claim to see aghor maestros like Guru Dattatreya, Guru Kanifnath, etc. There are several divine masters who, even after death, guide the Sadaks in their Sadhnas. How is it possible?  It is only possible when one attains salvation without death, in his or her terrestrial life, attaining divinity.
The question of being ready for death is in fact being detached from all the pleasure or comforts of life. He understands the real meaning of being dead, in his terrestrial life.
One who realizes the powers of life attains consciousness and gets consolidated with adored almighty.
।।  Alakh Aadesh ।।

http://aadeshnathji.com/death-salvation/

Tuesday, 3 February 2015

अघोर समागम २०१५ - Aghor Samagam 2015



ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश


अघोर समागम 2015



गत वर्ष की भाँती इस वर्ष भी अघोर समागम का आयोजन किया जा रहा है । इस अद्भुत समागम का आयोजन महाकाल नगरी उज्जैन में किया जाएगा । इस महा सम्मलेन का आयोजन 16 , 17 और 18 अप्रैल को किया जाएगा ।
इस अद्भुत सम्मलेन में श्री गुरु आदेशनाथजी द्वारा अघोर पंथ, साधन, साधना एवं अघोर के बारे में समझाया जाएगा । इस समागम का मुख्य उद्देश्य अघोर के बारे में प्रचलित भ्रांतियों को दूर करना है।
ऐसे कई अघोर अनुयायी हैं जो उचित मार्ग दर्शन के बिना भटक रहे हैं ।
                            इस समागम में साधको की उत्कंठा एवं समस्या का भी समाधान किया जाएगा ।
गत वर्ष किये गए समागम के फल स्वरुप जुड़े हुए साधको एवं जान साधारण में अघोर के प्रति भय का समापन हुआ है । इसी आकांक्षा के साथ श्री गुरुदेव इस बार समागम का आयोजन कर रहे हैं जिससे सही अघोर क्या है इसका दर्शन जन साधारण के सामने प्रस्तुत हो सके ।

आदि काल से अघोर के गुप्त रहने के कारण अघोर साधक और साधना से भय का निर्माण हो गया है । अघोर एक स्वछन्द रूप की साधना है जिसमे लोभ, मोह, क्षोभ, द्वेष, घृणा का कोई स्थान नहीं है ।
अघोर साधना में बस प्रेम ही प्रेम है । शिशुत्व प्रेम अपनी माँ से अपने पिता से ।
अघोर प्रेम ऐसा है जिसमे साधक इष्ट मांगता नहीं इष्ट प्रेम से वशीभूत होकर अपने शिशु को सब कुछ प्रदान करते हैं ।

पर इस पंथ के गुप्त होने की वजह से भ्रांतियों का निर्माण हो गया है और साधक गण भी इस पंथ से भय करने लगे हैं । अघोर समागम के माध्यम से इस भय को दूर करना है और तथाकथित नामधारी बाबाओं के मकड़जाल रुपी पाश से साधारण जन को अवगत करना है ।

इस समागम का उद्देश्य शिष्य बनाना, साधना देना या अघोर में सबको सम्मिलित करने का कदापि  नहीं है । इस सम्मलेन के माध्यम से अघोर संतो से संपर्क और उनकी संगती संभव है । साधना या दीक्षा की आशा लेकर कदापि न आएं ।

जिन साधको को अघोर को बेहतर रूप से जानने की इक्षा है यह सम्मलेन बस उनके लिए है ।
समागम के त्रि दिवसीय सम्मलेन में साधको को उचित मार्गदर्शन देने का प्रावधान है ।

पिछले वर्ष किये गए समागम के माध्यम से साधको में उचित ज्ञान और अघोर दर्शन हुआ था ।
समागम के माध्यम से साधको में फैली उत्कंठा को दूर करने का प्रयास किया गया था जिसमे निम्नलिखित चर्चा हुई थी
अघोर पंथ क्या है ?
अघोरी कौन होते हैं ?
अघोरी श्मशान में क्यों रहते हैं ?
अघोर पंथ की साधनाएं क्यों कठिन है ?
अघोर पंथ के साधक एकांत वास क्यों करते हैं ?
अघोर पंथ में मुंड और खप्पड़ का कया महत्व है ?
अघोर में स्थान परिवेश एवं क्रिया कलापों का कया रहस्य है ?
अघोर पंथ की साधनाओं में किनकी प्रमुखता होती है?
अघोर पंथ के साधक जिद्दी एवं कठोर शब्दों का उपयोग क्यों करते हैं ?
अघोर पंथ में निशा साधना का क्या महत्त्व है ?
अघोरी के खान पान रहन सहन पर जो रहस्य है उसे सभी साधकों के समक्ष रखा गया था ।
 इस बार भी साधको में अघोर ज्ञान फैले इसकी कामना हम महाकाल प्रभु श्री आदि नाथ से करते हैं ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aghor-samagam/aghor-samagam-2015

Thursday, 29 January 2015

अघोर समागम- Aghor samagam


ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

अघोर समागम

अघोर समागम का मुख्य उद्देश्य अघोर और तंत्र को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने का है । आदि काल से अघोर गुप्त रहा है । अघोर साधक शमशान या किसी गुफा में अपना जीवन व्यतीत करते थे । अघोर के दर्शन काफी दुर्लभ थे । जिसके पीछे शमशान में प्रेतों का भय और अघोरी साधुओं का रुखा स्वभाव मुख्य था । अघोर पंथ के साधको का मस्त मलंग रहना और बिना भय और सम्मान की चाह रख कर साधना अघोर को भयभीत बनता चला गया । जिसका फायदा नाम धारी अघोरी और तथाकथित तांत्रिकों ने उठाया ।
अघोर सहज और सरल है । अघोर में लोभ मोह क्षोभ घृणा और आसक्ति का कोई स्थान नहीं है । अघोर अपने में मस्त मलंग रहता है । उसे न दुनिया की खबर होती है ना ही दुनियादारी की । ऐसे में नामधारी बाबाओ ने अघोर के द्वारा किये गए प्रयोगो को और उनके स्वाभाव को दूसरे रूप में समाज के सामने प्रस्तुत कर भयभीत करना शुरू कर दिया ।
अपशब्द बोलना, मदिरा पान करके धुत्त रहना , व्यभिचार करना, सांसारिक को विभिन्न रूप से डराना की अगर मेरी बात नहीं माने तो ये कर दूंगा वो कर दूंगा ।
ऐसे में सांसारिक इष्ट से दूर होता चला गया और भयभीत होने लगा । इष्ट से प्रेम की जगह भय आ गया । ऐसे में फल स्वरुप बाबाओ का धंधा बढ़ चढ़ गया और अघोर और तंत्र के प्रति अनेक भ्रांतियां बन गयी ।
ऐसा वातावरण बन गया की एक अघोर साधक बस व्यभिचार करता है और अगर भड़क गया तो सांसारिक का जीवन बर्बाद कर देगा ।
इन सब भ्रांतियों को मुख्य रूप से समाप्त करने हेतु एवं सही अघोर के दर्शन करने हेतु श्री गुरु आदेशनाथ जी ने अघोर मंच एवं अघोर समागम की शुरुआत की है । इस मंच का उद्देश्य शिष्य बनाना या धन कमाना नहीं है अपितु अघोर का वास्तविक स्वरुप क्या है यह दर्शाना है । जन साधारण से दूर अति उग्र साधना पद्धिति जिसमे बस प्रेम ही प्रेम है इष्ट के लिए उसे सबके सामने लाना है ।
पिछले दो सालो के अथक प्रयास से मंच से जुड़े साधको एवं संसारिको में अघोर के प्रति भय कम हुआ है ।
इस प्रयास से साधको को सही मार्ग दर्शन मिले और अघोर पंथ के प्रति भय घृणा एवं भ्रांतियों का समापन हो ऐसा महाकाल प्रभु श्री आदि नाथ से कामना करते हैं ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aghor-samagam/

Wednesday, 28 January 2015

मन अति सूक्ष्म अति तीव्र- Man ati sukshm ati teevr



ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

मन अति सूक्ष्म अति चंचल और अति तीव्र है । इसको नियंत्रित करना उतना ही कठिन एवं जटिल है । मन को नियंत्रित करने का सफल उपाय किसी मछुआरे से सीखना होता है । एक मछुआरा भरे जलाशय में एक मजबूत धागे से अंकुश रुपी काँटा लगा कर फेंक देता है । जलाशय संसार है मन वो मीन जो इधर उधर भटकता रहता है । धागा संयम करने वाला साधन और अंकुश रुपी काँटा मन को संयमित करने का उपाय । मछुआरा आत्म ज्ञान ।
जैसे एक मछुआरा अंकुश रुपी कांटे में कोई जीव लगा कर मीन को आकर्षित करता है । उसी प्रकार आत्म ज्ञान श्रद्धा को साधन बना मन को आकर्षित करता है ।
आकर्षित मीन रुपी मन उस अंकुश रुपी कांटे में फस कर छटपटाता है । मछुआरा उसे उस समय नहीं खींचता अपितु मीन को फंसे रहने देता है । और धीरे धीरे अपनी और खींचता है । कभी भी तीव्र गति से नहीं खींचता है । अन्यथा मन रुपी मीन उस झटके में आहत हो उस अंकुश से घाव लेकर मुक्त हो जायेगा । जब मीन समीप हो तब उसे मछुआरा पकड़ कर एक छोटे से जल पात्र में डाल देता है । और वही जल पात्र उस मीन का संसार बन जाता है ।
इसी प्रक्रिया से मन को नियंत्रित किया जा सकता है।
श्रद्धा रुपी अंकुश से मन रुपी मीन को आकर्षित कर संयमता से मन को नियंत्रित कर एक साधक साधना में अग्रसर हो सकता है ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/man-ati-chanchal

सिद्धि का अर्थ - Siddhi ka arth

सिद्धि का अर्थ किसी भी प्रयास का फल है । चाहे वो एक नौकरी पेशा व्यक्ति का महीने के अंत में मिलने वाली तनख्वाह । या किसी साधक का साधना में सफलता । अलग अलग रूप हैं ।
सांसारिक ने कहा धन की यथोचित समृद्धि । ज्ञानी ने कहा आत्म ज्ञान । साधक ने कहा इष्ट की प्राप्ति ।
जब मैंने अपने गुरुदेव से चर्चा की उन्होंने कहा सिद्धि कुछ नहीं है बस पड़ाव है किसी भी पथ पे चलने वाले पथिक का । सिद्धि किसी भी साधक को सही पथ पे चलने का मार्ग दर्शन है ।
धन की प्राप्ति : धन क्षणिक है सांसारिक भोग विलास के कार्य आने वाला एवं सुलभता हेतु एक मार्ग । आवश्यक पर परम आवश्यक नहीं ।
आत्म ज्ञान : स्वयं का ज्ञान सबको है । सभी को पता है कि मैं क्या कर सकता हूँ । क्या नहीं कर सकता वो बस भ्रम है । जो नहीं किया जा सका उसके कार्य में कुछ कमी है । अगर मैं शिवांश काली का पुत्र और काली पुत्र भैरव का प्रिय हूँ तो जिस रूप में माँ को प्रेम से बुलाऊंगा या जिस प्रकार माँ को पुजुंगा माँ स्वीकारेगी । यह आत्म विश्वास है दंभ नहीं । माँ के प्रति प्रेम है । जो खाऊंगा माँ को वही भोग लगाऊंगा । माँ वही ग्रहण करेगी । जो कार्य करूँगा माँ उस कार्य में सहयोग करेगी एवं हर संभव विधि से रक्षा करेगी ।
इष्ट की प्राप्ति : हर जीव में माँ का अंश है । माँ कोई भी रूप लेकर सामने आ जाएगी । किस विधि से सामने आएगी क्या बोलेगी क्या कराएगी सब उनकी माया है । किस रूप में आवाज देगी यह समझना साधक का कार्य है । जिस रूप में पूजें क्या वही रूप आएगा बात करने ? माँ को पूजा दस भुज रूप में माँ आई दो भुजी । सब माया है । परम तो बस शून्य है । शून्य का कोई रूप नहीं । रूप है तो फिर अनेक ।
सिद्धि फलित तब जब परमेश्वर का अहसास हमेशा हो । काली पुत्र का संग हमेशा रहे । प्रेम से सरोबार जब क्रोध लोभ मोह के बंधन का अहसास ना हो । हर जीव माँ के रूप में मुस्कुराये ।
अलख आदेश ।।।

सिद्धि का अर्थ - Siddhi ka arth

सिद्धि का अर्थ किसी भी प्रयास का फल है । चाहे वो एक नौकरी पेशा व्यक्ति का महीने के अंत में मिलने वाली तनख्वाह । या किसी साधक का साधना में सफलता । अलग अलग रूप हैं ।
सांसारिक ने कहा धन की यथोचित समृद्धि । ज्ञानी ने कहा आत्म ज्ञान । साधक ने कहा इष्ट की प्राप्ति ।
जब मैंने अपने गुरुदेव से चर्चा की उन्होंने कहा सिद्धि कुछ नहीं है बस पड़ाव है किसी भी पथ पे चलने वाले पथिक का । सिद्धि किसी भी साधक को सही पथ पे चलने का मार्ग दर्शन है ।
धन की प्राप्ति : धन क्षणिक है सांसारिक भोग विलास के कार्य आने वाला एवं सुलभता हेतु एक मार्ग । आवश्यक पर परम आवश्यक नहीं ।
आत्म ज्ञान : स्वयं का ज्ञान सबको है । सभी को पता है कि मैं क्या कर सकता हूँ । क्या नहीं कर सकता वो बस भ्रम है । जो नहीं किया जा सका उसके कार्य में कुछ कमी है । अगर मैं शिवांश काली का पुत्र और काली पुत्र भैरव का प्रिय हूँ तो जिस रूप में माँ को प्रेम से बुलाऊंगा या जिस प्रकार माँ को पुजुंगा माँ स्वीकारेगी । यह आत्म विश्वास है दंभ नहीं । माँ के प्रति प्रेम है । जो खाऊंगा माँ को वही भोग लगाऊंगा । माँ वही ग्रहण करेगी । जो कार्य करूँगा माँ उस कार्य में सहयोग करेगी एवं हर संभव विधि से रक्षा करेगी ।
इष्ट की प्राप्ति : हर जीव में माँ का अंश है । माँ कोई भी रूप लेकर सामने आ जाएगी । किस विधि से सामने आएगी क्या बोलेगी क्या कराएगी सब उनकी माया है । किस रूप में आवाज देगी यह समझना साधक का कार्य है । जिस रूप में पूजें क्या वही रूप आएगा बात करने ? माँ को पूजा दस भुज रूप में माँ आई दो भुजी । सब माया है । परम तो बस शून्य है । शून्य का कोई रूप नहीं । रूप है तो फिर अनेक ।
सिद्धि फलित तब जब परमेश्वर का अहसास हमेशा हो । काली पुत्र का संग हमेशा रहे । प्रेम से सरोबार जब क्रोध लोभ मोह के बंधन का अहसास ना हो । हर जीव माँ के रूप में मुस्कुराये ।
अलख आदेश ।।।

क्षोभ और संसार

क्षोभ शायद मनुष्य जीवन का हिस्सा बन गया है । सांसारिक को संसार में रहने का क्षोभ , मनुष्य को मनुष्य योनि में आने का क्षोभ , सन्यासी को संन्यास में होने का क्षोभ , पुत्र को पिता से क्षोभ , पिता को पुत्र से क्षोभ । जो मिला उससे क्षोभ जो ना मिला उसका क्षोभ ।
हे साधक जो मिला उससे प्रसन्न रहो । जैसे मिला या मिलेगा वह महामाया का प्रसाद है । प्रसाद समझ के ग्रहण करो । प्रसाद हमेशा सर्वोत्तम ही होता है । बहाने न खोजो कि यह ऐसे ख़राब है वो वैसे ख़राब है । शरीर है तो शरीर से प्रेम करो त्याग कर परम बनने की चाह में इस शरीर को निरर्थक ना समझो । मात्रि कष्ट के चरम सीमा से प्राप्त हुए इस शरीर से ही यह ज्ञान, बात करने और सोचने की क्षमता प्राप्त हुई है । महामाया के परम रूप को जानने का अवसर मिला है । तो अब इससे ही घृणा क्यों?
जब तक है प्रेम करो और विदेह बनने का प्रयास करो । जब शरीर से आत्मा का प्रस्थान हो जायेगा तो परम बनने का प्रयास करना । शायद क्षोभ में ही क्षोभ को परिभाषित किया जा सकता है । शायद इसिलिए क्षोभ करने वाले मनुष्य पर मेरा क्षोभ ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/kshobh-aur-sansar
/

Wednesday, 21 January 2015

अविरल धारा- Aviral dhara

मैं तो नदी की अविरल धारा हूँ बहता रहूँगा ,बिना रुके बिना ठिठके ।
जो मिलेंगे मिलता जाऊंगा जो छूटेंगे छोड़ता जाऊंगा पर बहता जाऊंगा ।
कुछ साथ चलेंगे तो लेकर चलता जाऊंगा ।
कुछ ज्ञान रूपी जल को मिलायेंगे समाहित कर चलता जाऊंगा ।
कुछ ज्ञान रूपी जल को पि लेंगे पिलाता जाऊंगा ।
कुछ गंदगी धोयेंगे धोता जाऊंगा पर बढ़ता जाऊंगा ।
कुछ पत्थर फेंक केे आनंद लेंगे देता जाऊंगा पर बढ़ता जाऊंगा ।
कुछ मेरे बहाव को रोकेंगे तो घूम कर बढ़ता जाऊंगा ।
कुछ की शक्ति अधिक है साधन सक्षम हैं तो रुक जाऊंगा ।
पर समय समाप्त होते ही निकल जाऊंगा पर बढ़ता जाऊंगा ।
अंत में महामाया रुपी महासमुद्र है । जिसमे समाहित हो जाऊंगा ।
स्व मैं मेरा मुझे मुझसे घाव गंदगी एवं सबके दुःख और घृणा को खो जाऊंगा ।
अंत में माँ की गोद में सो जाऊंगा ।
अविरल बढ़ता हुआ अंत में थम कर माँ की गोद में विश्राम कर पाउँगा ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aviral-dhara/

अघोर पंथ- Aghor panth

अघोर पंथ की परिभाषा ही घोर से घोरतर और घोरतर होकर भी अघोर ।।।
अघोर पंथ की साधना करने एवं दीक्षा हेतु एक साधक को अनेक बातों का ध्यान रखना होता है ।
पर मुख्यतः एक साधक के अंदर निम्लिखित गुणों का होना आवश्यक है ।
1. साधक को निर्भय और निडर होना होता है । अघोर पंथ की साधना में विपरीत अनुभुतियों का भण्डार है । एक अघोर साधक वीर मार्गी साधना में अग्रसर होता है । अतः इस साधना में उग्र परीक्षा होती है । साधक के समक्ष अति दुष्कर परिस्थिति का भान होने लगता है । साधना स्थल पर विभिन्न शक्तियों का आगमन होता है । अगर साधक निडर ना हो और प्रेत या पिशाच के द्वारा निकाली गयी आवाजों या दृश्य से भाग खड़ा हो तो नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।
2. साधक सम भाव से रहे । अघोर साधक को कष्ट दुःख दर्द प्रसन्नता एवं सुख में सम भाव से रहना आना चाहिए । अक्सर देखा जताभई कि एक साधक जब परिस्थितियां विपरीत हो तब ज्यादा साधना करते हैं और जब प्रसन्न तो साधना भूल जाते हैं । साधना हर समय चलते रहना चाहिए । दुःख हुआ तो क्रोध करने लगे प्रसन्न हुए तो सबको आशीर्वाद देने लगे । जब सारी परिस्थिति में सम भाव से रहें तो साधना में सफलता मिलती है । भाव इष्ट एवं गुरु का होना चाहिए । उस भाव में भी सम रहने का प्रयास होना चाहिए ।
3. घृणा इर्ष्या द्वेष मोह माया आसक्ति एवं क्रोध से यथा शक्ति दूर होना चाहिए । जब किसी की सफलता या उपलब्धि हो तो इर्ष्या का या द्वेष का भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए । किसी भी वस्तु व्यक्ति या जीव से किसी भी रूप में घृणा नहीं करनी चाहिए । मल मूत्र गन्दगी से साधना में विघ्न होगा यह बस मन के भाव हैं । इन सब भाव को त्यागना होता है ।
4. परम सत्ता का दर्शन हर जीव वस्तु एवं पदार्थ में होना चाहिए । यह संसार महामाया का बनाया हुआ है । हर जीव वस्तु एवं पदार्थ में महामाया के अंश का दर्शन होना चाहिए ।
5. ज्ञान गंगा को समेटने की शक्ति । ज्ञान गंगा कही से से भी प्रवाहित हो सकती है । जहा से ज्ञान मिले ग्रहण करने की क्षमता पूर्ण रुपेन विकसित होनी चाहिए । कभी एक छोटा बालक या बालिका अति गुह्य बात कह जाते हैं । जाने अनजाने में कोई व्यक्ति कुछ बता जाता है । इन सभी बातों को ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए ।
6. दंभ स्व प्रतिष्ठा से दूर होना चाहिए । मनुष्य शक्तियों के भाव में स्व प्रतिष्ठा पाने का भाव रखते हैं । जो मिला है महामाया का प्रसाद है । मेरा कुछ नहीं । मेरे पास कुछ नहीं । इस भाव के संग जीवन सफल होता है । अन्यथा ईवा और प्रतिष्ठा का भाव या आकांक्षा रखने से क्रोध और इर्ष्या उत्पन्न होती है ।
7. अंतत गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव हमेशा होना चाहिए । गुरु के वाक्य सर्वोपरि होने का भाव होना चाहिए । गुरु से चर्चा अवश्य होनी चाहिए । अपना तथ्य सामने रख कर गुरु से वार्ता बिना अश्रद्धा के करनी चाहिए । गुरु ही सूत्र धार हैं । गुरु ही परम परमात्मा हैं । गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान को आत्मसात करना चाहिए ।
इन सारे मुख्य रुपी आचरण से पात्रता में वृद्धि होती है । और गुरु कृपा एवं इष्ट प्राप्ति होती है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-panth3/

Tuesday, 20 January 2015

अघोर पंथ - Aghor panth

मैं अघोर पंथ में आना चाहता हूँ । अघोर विद्या सीखना चाहता हूँ । अघोर पंथ मुझे बहूत अच्छा लगता है । ऐसे प्रश्न अधिकाधिक सुनने को मिलते हैं । अघोर पंथ लिखित रूप तथा सुनने में रोमांचक अवश्य है । पर व्यावहारिक रूप में कठिन है । अघोर पंथ में असरल हो चुके मनुष्य को सरल बनना होता है । व्यसक हो चुके मनुष्य में वापस शिशुत्व भाव को जागृत कराता है । एक मनुष्य जो भेद करना सीखता है उसे भेद रहित बनना सिखाता है ।
इन सब रहस्यों को पलट कर वापस उसी भाव में आना अत्यधिक दुष्कर है । इस मंच का उद्देश्य किसी को अघोर पंथ की दीक्षा देना कदापि नहीं है । ना ही अघोर पंथ में आने का आग्रह करना है ।
जो साधक अघोर पंथ में आना चाहते हैं उनसे निवेदन है पहले अपने अंदर की क्षमता को आंकें । अघोर की जीवन शैली और कठिनाईयों को समझें ।
अघोर सुख सुविधा कष्ट एवं कठिन परिस्थितियों में सम रहता है । ऐसे में सांसारिक अपने घर में ही बिना रौशनी के रह के देखें । बिना भय के साधना करके देखें । जब साधना में भय का स्थान ना हो तब अघोर साधना की ओर अग्रसर हों । अन्यथा साधना में असफ़लता एवं अनुभूतियों का आभाव रहता है । साधक को जब किसी भी वस्तु से या व्यसन से प्रेम हो जाये उससे दूर होकर देखें । घृणा की जगह प्रेम से दूर होकर देखें ।
मसान में विरक्ति का अनुभव करने मसान में बैठ कर देखें । रोमांच के लिए या शीघ्र अनुभूति के लिए अघोर में ना आयें । अघोर पंथ दो धारी तलवार है जिसमे मूठ नहीं है । नग्न हाथों से ही पकड़ना है । चलाने में अगर थोड़ी सी भी चूक हुई तो स्वयं को आहत करना अवश्यम्भावी है । मेरे इस लेखन का उद्देश्य भयभीत करना नहीं है पर जो साधक अघोर के बारे में साहित्य एवं श्रवन कर अघोर में बिना जाने आना चाहते हैं उन्हें अघोर पंथ की वास्तविकता से साक्षात्कार कराने का प्रयास कर रहा हूँ ।
अतः अघोर में आने से पहले इस पंथ की वास्तविकता को समझें । फिर इस पंथ में आने का निर्णय करें ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-panth-3/

अघोर / Aghor

क्या अघोर पंथ खतरों से भरा हुआ है?
हाँ अघोर पंथ खतरों तथा अप्राकृतिक अनुभूतियों से भरा हुआ है ।  इस पंथ के साधक अक्सर विपरीत बुद्धि के होते हैं । जब मन में आया माँ को प्रेम किया कभी बेताली बोल दिया कभी पिशाचिनी बोल दिया । पर प्रेम ह्रदय से करते हैं । ना कोई छल ना कपट ना ही कोई इर्ष्य रखते हैं ।  साधारणतः साधक की इक्षा होती है माँ सौम्य रूप में दर्शन दे । पर अघोर पंथ के साधक माँ को प्रचंड रूप में ध्यान करते हैं । प्रचंड रूप की साधना में प्रचंड अनुभूति एवं अद्भुत विपरीत अनुभूति होती है ।
अघोर पंथ के साधक महामाया तथा महाकाल में रमे हुए होते हैं ।
अघोर पंथ की परीक्षा भी कठिन होती है । जो साधक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ वो सब कुछ पाया अन्यथा सब कुछ त्याग कर भूल गया ।
अघोर उन साधकों के लिए कदापि नहीं है जो भय में साधना करते हैं । भैरव की साधना करते समय भय दूर करने के लिए हनुमान जी की फोटो जेब में रखते हैं कि अगर कोई भूत प्रेत आया तो हनुमान जी रक्षा करेंगे ।
रक्षा तो अवश्य होगी पर प्रेत राज क्रोधेश स्वयं रक्षा कर लेंगे । कुछ पाना है तो कुछ परेशानियों से गुजरना भी पड़ेगा ।
आग का दरिया है डूब के जाना है।
इस दरिया में डूबना तो है बस डूब जाना है। उस पार वही लगायेंगे । अगर खुद कोशिश की निकलने की तो प्रभु बैठ कर मुस्कुराएंगे  ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-anubhuti/