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Friday, 27 February 2015

औघड़ वाणी

औघड़ वाणी:  अगर संन्यास के बाद भी भौतिक मोह व्याप्त है और सांसारिक प्रतिष्ठा की भूख है तो संन्यास का कोई मायने नहीं है । हर साधक के कर्म पूर्व निर्देशित होते हैं । दिखावे का चोला और दिखावे का संन्यास क्षणिक है ।
कुछ सन्यासी कहते हैं अकेले में क्या किया जाए ?
अकेलापन और संसार से दूर अगर रहने का निर्णय कर संन्यास लिया गया है तो मन को संयमित कर बाँध कर अगर इष्ट में रमन करना प्रमुख है । अन्यथा समाधी के बाद भी आत्मा इसी चक्कर में भटकती रहेगी ।

अलख आदेश ।।।

Tuesday, 10 February 2015

अघोरत्व

                                       ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                        अघोरत्व बस एक पदवी या कोई पंथ नहीं है । यह एक अवस्था है । ऐसी अवस्था जिसमे एक साधक सहज और सरल हो जाता है । इष्ट की अनुभूति सहज रूप में करता है और सरल रूप में उपासना करता है ।अघोर ऐसे मस्तोलो का जगह नहीं जहाँ बस बाह्य नशा कर झुमा जा सके । अघोर संगती स्वयं ही नशा है । उस नशे का भाव शायद ब्रम्हांड में कही नहीं मिल सकता है । ऐसा नशा जिसमे साधक शरीर पञ्च भूतों के बंधन से मुक्त स्वछन्द विचरण करता है । मन की गति से विचरण करता है ।
                                  शैशव काल से सामाजिक रूप से बनायी गयी श्रद्धा के भाव को जिसमे इश्वर का अस्तित्व बस मंदिर और पूजा स्थल तक होता है उसे त्याग कर वापस उसी रूप में जाना होता है । शिशु हर समय अपनी माँ को खोजता रहता है और उसकी माँ का चेहरा सबसे प्यारा लगता है । उसी प्रकार माँ उसे अपने नजर से दूर नहीं होने देती । हर क्षण उसकी जरुरत पूरी करती रहती है । वापस उसी शैशव काल में जाना पड़ता है , हर वस्तु एवं हर जीव में समझना होता है और श्रद्धा के भाव को वृहद् करना होता है ।
अलख आदेश ।।।



Monday, 9 February 2015

औघड़ वाणी

                                      ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                          
                                               औघड़ वाणी : अघोर की आकांक्षा रखे साधक का भटकाव होना अवश्यम्भावी है । जब तक भटकाव नहीं होगा तब तक महामाया की माया समझ नहीं आएगी । भटको अवश्य भटको पर भटकने के बाद अपने गंतव्य को समझने का प्रयास करो । भटकाव को समझने के लिए आवशक है ग्रहण मुद्रा । शक्ति को पाने के बाद उसी में रमने और प्रदर्शन से पहले आवश्यक है ग्रहण मुद्रा को समक्ष रखना । अगर ग्रहण मुद्रा में ना रहे तो स्वः प्राथमिकता ले लेगा ।
                                             अक्सर नए साधको को देखता हूँ अघोर में आये और स्वयं को अघोरी और औघड़ बताने लगे । अघोरी और औघड़ की परिभाषा कहीं ऊँची है । कुछ कहते हैं मुझे भय नहीं लगता कहीं भी बिठा दो । दंभ भाव में जब उनको अघोरानुभुती होती है तो फिर गुरु पर सवाल उठाने लगते है ।
हमारे सदगुरुदेव का वचन है जो गुरु कहे वो करो जो करे वो कदापि ना करो । उनकी शक्ति और सामर्थ्य कहीं ऊँचा है । उनकी एक ताली से मसान भयंकर रूप लेकर समक्ष आ जाता है ।

                                                  और जब नए साधक अपने आपको समर्थ समझ मसान को गुरु के ही तरह से जगाने का प्रयास करते हैं तब कुछ हासिल नहीं होता है । अगर कोई उन्हें कुछ बताये तो स्वः को समर्थ समझ उनसे भिड जाते हैं ।गुरु पराकाष्ठा पर विराजित होकर भी जब सीखने का मौका मिलता है सीखने का प्रयास करते हैं ।  तो उनके इसी भाव को समक्ष रख कर इसी भाव से ग्रहण मुद्रा को प्राथमिकता दें । जीवन और शरीर नश्वर है । आत्मा इसी ज्ञान और स्वः को समझ कर शिव के समक्ष जाती है और त्रुटी होने पर वापस जन्म लेती है ।
अलख आदेश ।।।




औघड़ वाणी

ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                              औघड़ वाणी : अघोर पंथ की वास्तविकता से परिचय कराना गुरु का कार्य है । गुरु हर संभव जटिलताओं से साधक का परिचय कराते हैं । नए साधकों के प्रश्न जिसमे मैं अघोर मार्ग के कठिन स्वरुप को भयभीत करने के उद्देश्य से लिख रहा हूँ ऐसा कतई नहीं है । मैं तो गुरु आज्ञा से अघोर पंथ के वास्तविक रूप को सभी के सामने रख रहा हूँ । इससे भयभीत होना या प्रेम होना आपका दायित्व है ।
                                              आपकी इक्षा पर पुर्णतः निर्भर करता है । अघोर सहज है और मनुष्य जीवन काल को समाप्त करता हुआ जटिलता की और बढ़ता रहता है । जटिलता से वापस सहजता की ओर अग्रसर होना अत्यधिक कठिन है ।
                                              अघोर में भय का कोई स्थान नहीं है । अगर भयभीत हुए तो कुछ समय की और प्रतीक्षा कर लें । अक्सर देखा गया है । अभी कुछ देखा या सुना या पढ़ा मन लालायित हो जाता है उस कार्य को करने के लिए । ऐसा अघोर पंथ में प्रवेश हेतु कतई ना करें । पढ़ते रहें समझते रहें एवं अघोर को जानते रहें । जब स्वः गुरु आत्मा का आदेश हो जाये कि अघोर पूर्णतः आपके लिए ही है तब प्रवेश लें या अघोर साधनाओं की ओर अग्रसर हों ।

अलख आदेश ।।।


http://aadeshnathji.com/aughad-waani-14/ 

Wednesday, 21 January 2015

महाकाली प्रचंड है- Mahakali prachand hai

महामाया महाकाली प्रचंड है पर राक्षसी नहीं । भैरव क्रोधेश हैं भूतपति हैं पर शैतान या राक्षस नहीं हैं । आज कल हिन्दू धर्म के पतन के लिए चित्रकार रुपी महानुभावों ने अजीब अजीब चित्रें बना कर सबके सामने प्रस्तुत कर दी हैं । जिन लोगों को सत्यता का भान नहीं वो उन्ही चित्रों के माध्यम से मात्रि स्वरूपी महामाया की विपरीत रूप वाली छवि की साधना करते हैं या भयभीत हो सभी को भयभीत कराते हैं ।
महामाया का प्रचंड रूप अपनी संतान की रक्षा करने के लिए होता है । इस संसार में भी अगर आप किसी स्त्री की संतान को हानि करने की कोशिश करते हैं । एक अबला स्त्री प्रचंड रूप लेकर अहित करने वाले शक्तिशाली पुरुष से भी लड़ जाती है । किसी भी मात्रि स्वरुप चाहे वो श्वान प्रजाति की हो या बन्दर प्रजाति की । हर रूप में माँ अपने संतानों के लिए प्रचंड भाव रक्षा हेतु रखती है ।
महामाया के हस्त कमलों में अस्त्र शस्त्र हैं पर वे सभी सुप्तावस्था में होते हैं । माँ के हाथों ने वर एवं अभय का भाव सर्वोपरी है । जिससे माँ अपने अभय मुद्रा से गोद में उठा वर मुद्रा हस्त से अपने संतान एवं अंश के सर में हाथ फेरती हैं । और मनुष्य के शत्रु (क्रोध , मोह, क्षोभ इत्यादि) को अपने शस्त्रो से काट देती हैं । माँ के अति प्रचंड रुपी स्वरुप में अभय और वर मुद्रा स्पष्ट रूप से दिखता है । जिनको माँ की आखों में डर की अनुभूति होती है । वो उग्र रूप में प्रचंड हुई स्त्री के आँखों का स्मरण कर लें । उस स्त्री की आँखें भी रक्तिम एवं क्रोध से परिपूर्ण होती हैं । प्रचंड रुपी स्वरुप में अगर माँ के मुख को देखा जाये तो माँ हसती हुई प्रतीत होती है जो सभी प्रकार के डर भय के भाव को नष्ट करने की क्षमता रखता है ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/mahakali-prachand-hai/

औघड़ वाणी - Aughad waani

औघड़ वाणी : इक साधक का जीवन अति कठिन होता है । वाणी , रहन सहन , भाव – भंगिमा , जीवन शैली आदर्शों के एक पतली सी रस्सी पर चलने के समान होता है । इसी पर चलते जाना है जब तक स्वयं महामाया अपनी गोद में ना उठा ले । जब तक स्व से परम ना बन जाएँ ।
अन्यथा थोड़ी सी भी चूक बदनामी के अँधेरी घाटी में गिरा देता है । ऐसा बस साधक के संग नहीं होता अपितु वह अपने आराध्य एवं पंथ की छवि को भी ठेस पहुचाता है । तथा श्रद्धा रखने वाले शिष्य एवं मनुष्य की श्रद्धा को भी हानि पहुचाता है । अतः साधना पथ पर उन्नति प्राप्त कर चुके साधक की वाणी और कर्म सम भाव में ना हों तो उसके संग इष्ट , मनुष्य की श्रद्धा एवं भक्ति भी हानि सहन करती है ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-waani5/

अघोर पंथ- Aghor panth

अघोर पंथ की परिभाषा ही घोर से घोरतर और घोरतर होकर भी अघोर ।।।
अघोर पंथ की साधना करने एवं दीक्षा हेतु एक साधक को अनेक बातों का ध्यान रखना होता है ।
पर मुख्यतः एक साधक के अंदर निम्लिखित गुणों का होना आवश्यक है ।
1. साधक को निर्भय और निडर होना होता है । अघोर पंथ की साधना में विपरीत अनुभुतियों का भण्डार है । एक अघोर साधक वीर मार्गी साधना में अग्रसर होता है । अतः इस साधना में उग्र परीक्षा होती है । साधक के समक्ष अति दुष्कर परिस्थिति का भान होने लगता है । साधना स्थल पर विभिन्न शक्तियों का आगमन होता है । अगर साधक निडर ना हो और प्रेत या पिशाच के द्वारा निकाली गयी आवाजों या दृश्य से भाग खड़ा हो तो नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।
2. साधक सम भाव से रहे । अघोर साधक को कष्ट दुःख दर्द प्रसन्नता एवं सुख में सम भाव से रहना आना चाहिए । अक्सर देखा जताभई कि एक साधक जब परिस्थितियां विपरीत हो तब ज्यादा साधना करते हैं और जब प्रसन्न तो साधना भूल जाते हैं । साधना हर समय चलते रहना चाहिए । दुःख हुआ तो क्रोध करने लगे प्रसन्न हुए तो सबको आशीर्वाद देने लगे । जब सारी परिस्थिति में सम भाव से रहें तो साधना में सफलता मिलती है । भाव इष्ट एवं गुरु का होना चाहिए । उस भाव में भी सम रहने का प्रयास होना चाहिए ।
3. घृणा इर्ष्या द्वेष मोह माया आसक्ति एवं क्रोध से यथा शक्ति दूर होना चाहिए । जब किसी की सफलता या उपलब्धि हो तो इर्ष्या का या द्वेष का भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए । किसी भी वस्तु व्यक्ति या जीव से किसी भी रूप में घृणा नहीं करनी चाहिए । मल मूत्र गन्दगी से साधना में विघ्न होगा यह बस मन के भाव हैं । इन सब भाव को त्यागना होता है ।
4. परम सत्ता का दर्शन हर जीव वस्तु एवं पदार्थ में होना चाहिए । यह संसार महामाया का बनाया हुआ है । हर जीव वस्तु एवं पदार्थ में महामाया के अंश का दर्शन होना चाहिए ।
5. ज्ञान गंगा को समेटने की शक्ति । ज्ञान गंगा कही से से भी प्रवाहित हो सकती है । जहा से ज्ञान मिले ग्रहण करने की क्षमता पूर्ण रुपेन विकसित होनी चाहिए । कभी एक छोटा बालक या बालिका अति गुह्य बात कह जाते हैं । जाने अनजाने में कोई व्यक्ति कुछ बता जाता है । इन सभी बातों को ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए ।
6. दंभ स्व प्रतिष्ठा से दूर होना चाहिए । मनुष्य शक्तियों के भाव में स्व प्रतिष्ठा पाने का भाव रखते हैं । जो मिला है महामाया का प्रसाद है । मेरा कुछ नहीं । मेरे पास कुछ नहीं । इस भाव के संग जीवन सफल होता है । अन्यथा ईवा और प्रतिष्ठा का भाव या आकांक्षा रखने से क्रोध और इर्ष्या उत्पन्न होती है ।
7. अंतत गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव हमेशा होना चाहिए । गुरु के वाक्य सर्वोपरि होने का भाव होना चाहिए । गुरु से चर्चा अवश्य होनी चाहिए । अपना तथ्य सामने रख कर गुरु से वार्ता बिना अश्रद्धा के करनी चाहिए । गुरु ही सूत्र धार हैं । गुरु ही परम परमात्मा हैं । गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान को आत्मसात करना चाहिए ।
इन सारे मुख्य रुपी आचरण से पात्रता में वृद्धि होती है । और गुरु कृपा एवं इष्ट प्राप्ति होती है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-panth3/

मोह माया एवं इक्षा- Moh maya aur iksha

मोह माया एवं इक्षा तो साधना पथ में भी होता है । साधक की महामाया के दर्शन की वार्ता करने की सम्मुख मात्रि प्रेम पाने की होती है । पारलोकिक शक्तियों को देखने एवं यथार्थ जानने की इक्षा होती है । यह भी तो मोह है । महामाया के माया में कार्य सिद्धि की इक्षा भी तो माया का अंश है ।
पर एक सच्चा साधक बिना इक्षा किये अग्रसर होता है । उच्च कोटि के साधक बिना किसी इक्षा के साधना करते हैं । उनकी साधना करने की इक्षा ऐसी होती है जैसे एक तैराक जिसे बस तैरना अच्छा लगता है । तट पर आकर तैराकी को समाप्त करना नहीं । इस साधना रुपी नदी में डूबते रहें तैरते रहें । सब सुलभ हो जाता है ।
महामाया के दर्शन की इक्षा होती है फिर भी इक्षा को प्रकट किये बिना साधना करते हैं । इस साधना रुपी पथ पर बस चलते रहते हैं । इस पथ पर भ्रमित करने तथा भटकाने हेतु महामाया सिद्धियाँ प्रदान करती रहती है । सिद्ध साधक सिद्धि होने के वावजूद उस सिद्धि का भान नहीं रखते । अघोर सिद्धियों को अपने मुंड में जगह दे देते हैं । अपने पास रखने या उन सिद्धियों से कार्य की अभिलाषा नहीं रखते । शिष्यों तथा निकटतम व्यक्तियों का कल्याण भी करते हैं पर प्रसिद्धि या सेवा की इक्षा नहीं रखते हैं । जब सिद्धि या शक्तियों से कार्य हेतु इक्षा होने लगे तो उसी में रमने की इक्षा होने लगती है ।
अतः जो साधक मोह करके भी मोह ना करें । दर्शन की अभिलाषा हो पर सब माँ की इक्षा और प्रारब्ध पर छोड़ दें । जब माया के संग होकर भी माया का तनिक भान ना हो । महामाया प्रसन्न भाव में शिशु रूप में गोद में उठा कर प्रेम करती है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/moh-iksha/

श्रद्धा और भक्ति - Shraddha aur bhakti

श्रद्धा किसी और से प्रभावित होकर नहीं की जाती । श्रद्धा भक्ति और विश्वास अपने अनुभव से होता है । कोई साधक अपने गुरु के लिए किसी से भी लड़ जाता है और कोई समझाता है । उसी तरह अगर कोई अपने गुरु के बारे में बताये तो पहले उनसे चर्चा करें । उनकी भक्ति को समझे । उनकी भक्ति से मार्ग दर्शन लें ।
कोई जब मुझसे मेरे गुरुदेव के बारे में कहता है । मेरी प्राथमिकता होती है पहले उनसे संपर्क करो । ज्ञान प्राप्त करो । उनका मुझे शिश्य रूप में स्वीकार करना मेरे लिए महामाया कि कृपा थी । शायद किसी और लिए कोइ और कारन हो सकता है । क्यूंकि साधना पथ पर आप अकेले चलते हैं ।
गुरु पथ का मार्ग दर्शन कर महामाया के सामने खड़ा कर देते हैं । पर दर्शन करना किस रूप में माँ का दर्शन होगा यह स्वयं की श्रद्धा है ।
गुरु कहें हर जीव पदार्थ में शिव हैं महामाया हैं । साधक उनका अनुसरण करे पर हर जीव के आँखों में माँ का दर्शन करे । अपनी अपनी श्रद्दा है । अतः मार्ग दर्शन लें संतों से मिलें । ज्ञान प्राप्त करें । किसी ने गुरु बना लिया आवश्यक नहीं की वो आपके भी गुरु बन जाएँ ।
कुछ सांसारिक कहते हैं इस संत से जुड़े हुए व्यक्तियों में सब उच्य स्थान पर हैं । किसी भी चीज का आभाव नहीं है । क्या संत संगती धन प्राप्ति के लिए की जाती है? कदापि नहीं ।
संत संगती आत्म शुद्धि एवं स्वयं चिंतन के लिए की जाती है । जब आत्मा शुद्ध होगी एवं आत्म क्षमता का आभास होगा तब सारे मार्ग स्वयं दिखेंगे । उत्तीर्णता स्वयं में आत्मसात होगी । कोई मार्ग अवरुद्ध नहीं होगा ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/shraddha-bhakti-vishwas/

Tuesday, 20 January 2015

अघोर पंथ - Aghor panth

मैं अघोर पंथ में आना चाहता हूँ । अघोर विद्या सीखना चाहता हूँ । अघोर पंथ मुझे बहूत अच्छा लगता है । ऐसे प्रश्न अधिकाधिक सुनने को मिलते हैं । अघोर पंथ लिखित रूप तथा सुनने में रोमांचक अवश्य है । पर व्यावहारिक रूप में कठिन है । अघोर पंथ में असरल हो चुके मनुष्य को सरल बनना होता है । व्यसक हो चुके मनुष्य में वापस शिशुत्व भाव को जागृत कराता है । एक मनुष्य जो भेद करना सीखता है उसे भेद रहित बनना सिखाता है ।
इन सब रहस्यों को पलट कर वापस उसी भाव में आना अत्यधिक दुष्कर है । इस मंच का उद्देश्य किसी को अघोर पंथ की दीक्षा देना कदापि नहीं है । ना ही अघोर पंथ में आने का आग्रह करना है ।
जो साधक अघोर पंथ में आना चाहते हैं उनसे निवेदन है पहले अपने अंदर की क्षमता को आंकें । अघोर की जीवन शैली और कठिनाईयों को समझें ।
अघोर सुख सुविधा कष्ट एवं कठिन परिस्थितियों में सम रहता है । ऐसे में सांसारिक अपने घर में ही बिना रौशनी के रह के देखें । बिना भय के साधना करके देखें । जब साधना में भय का स्थान ना हो तब अघोर साधना की ओर अग्रसर हों । अन्यथा साधना में असफ़लता एवं अनुभूतियों का आभाव रहता है । साधक को जब किसी भी वस्तु से या व्यसन से प्रेम हो जाये उससे दूर होकर देखें । घृणा की जगह प्रेम से दूर होकर देखें ।
मसान में विरक्ति का अनुभव करने मसान में बैठ कर देखें । रोमांच के लिए या शीघ्र अनुभूति के लिए अघोर में ना आयें । अघोर पंथ दो धारी तलवार है जिसमे मूठ नहीं है । नग्न हाथों से ही पकड़ना है । चलाने में अगर थोड़ी सी भी चूक हुई तो स्वयं को आहत करना अवश्यम्भावी है । मेरे इस लेखन का उद्देश्य भयभीत करना नहीं है पर जो साधक अघोर के बारे में साहित्य एवं श्रवन कर अघोर में बिना जाने आना चाहते हैं उन्हें अघोर पंथ की वास्तविकता से साक्षात्कार कराने का प्रयास कर रहा हूँ ।
अतः अघोर में आने से पहले इस पंथ की वास्तविकता को समझें । फिर इस पंथ में आने का निर्णय करें ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-panth-3/

श्री आदेश नाथ जी

मेरे गुरुदेव प्रभु श्री आदेश नाथ जी के अनुपम वचन :
सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में एक अच्छी बात थी कि उस समय मनुष्य , देव एवं दानव की वेश भूषा , वार्ता , रहन सहन अलग थी ।
देव सुन्दर स्वच्छ आभूषण युक्त एवं संस्कृत बोलते थे । सभी से प्रेम तथा कृपा करते थे । देव सत्कर्म में लीन रहते थे ।
मनुष्य साधारण क्रियाकलापों को करते और हिंदी बोलते थे । सांसारिक कृत्य कर परमेश्वर की उपासना करते थे ।
दानव गंदे एवं मांस मदिरा पी कर उद्धम मचाते थे । अपशब्द बोलते थे । मनुष्य तथा देवों को परेशान करते थे।
जब कलिकाल का पदार्पण हुआ तब सब एक सम हो गए । सबकी वेश भूषा व्यवहार तथा वार्ता एक सामान हो गयी । अंतर कर पाना मुश्किल हो गया ।
सब एक साथ रहने लगे । देव मनुष्य और दानव के भाव ही इस पृथ्वी पर रह गए ।
पर मनुष्य की बुद्धि जीवित है । देव मनुष्य और दानव में भेद उनके कार्य कलापों से ज्ञात किया जा सकता है । पर व्यवहार तथा भेद जानने के लिए थोडा परिश्रम करना पड़ेगा । भाव तथा क्रिया कलापों से ही जाना जा सकता है कि कौन देव है कौन मनुष्य और कौन दानव ।
जय गुरुदेव ।।। श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश आदेश आदेश ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aadeshnathji-vachan/

औघड़ वाणी- Aughad waani

औघड़ वाणी : मनुष्य किसी साधक में एक अलोकिक प्रकाश देखते हैं । प्रकाश पुंज को खोजते हुए जब प्रकाश पुंज की ओर अग्रसर होते हैं । जब प्रकाश की ओर बढ़ते हैं । तब प्रकाश पुंज तेज होता जाता है संग में उस प्रकाश की ऊष्मा भी तेज होती है । शरीर का तेज एवं ऊष्मा में भी वृद्धि होती है । जब प्रकाश पुंज के निकट होते हैं तब शरीर से भी तेज निकलता है ऊष्मा निकलती है प्रकाश निकलता है । अगर साधक उस समय इस भान में रहे कि तेज, ऊष्मा या प्रकाश उससे प्रवाहित हो रहा है तो भटक जाता है ।
इस बात को भूल जाता है कि प्रकाश परम पुंज से निकल कर उससे मात्र प्रवाहित हो रहा है। कुछ साधक प्रकाश पुंज तक पहुँचने से पहले ही बैठ कर अपने आप को परम समझने लगते हैं ।
अपितु परम तो कुछ और दूरी पर है ।
जो साधक परम तक पंहुचा और परम प्रकाश पुंज में समाहित हो गया वह उसी में लीन हो गया ।
अलख आदेश ।।।