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Saturday, 7 February 2015

सद्गुरुदेव


ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश




बड़ा भाग्य सदगुरु पाया, शक्तिपात कर दीक्षा दे दीन्हा।
बड़ी करुणा करी मूर्ख पर,गुरु मंत्र फूँक अपना लिया।
परलोकों का विचरण पाया, गुरु कृपा हम पर कर दीन्हा।
तीन नाड़ी को बंध खुलायो,ज्ञान साधना सब उडेल डाला।
गुरु कन्होबा अर्थ बतायो,सिद्ध साधना सब कर डाली ।
शिव ज्योति की अलख जगाई,तब परम ज्योति भीतर घट छाई।
खट चक्रन का भेदन कर, एक लात में ब्रहमांड खिलाया।
हद से पार अनहद बजाया,घट में अम्रत वर्षा करवाया।
काल को नथ बैठ सदगुरु , साकार रूप में महाकाल दिखाया।
संशय भय सब दूर भगाया,अतिउग्र क्रोध सब शांत कराया।
परम प्रेम की वर्षा पाता, जो कोई शरण में आपके आता।
टोक रोक अनंत नीर रुकवाया, गुप्त रूप से अश्रु बहाता।
गौरान्वित सा अचम्भित देख इन अश्रु को कर समर्पित, हे गुरुदेव दूर करो अब अनंत की दूरी ।

नयन देख पावत नाहीं,पुष्प मध्य जैसे बास।
गुरु तत्व क्षण क्षण है,करत जिय में वास।।

अलख आदेश ।।।
(अनंत नाथ के द्वारा)

Wednesday, 28 January 2015

सिद्धि का अर्थ - Siddhi ka arth

सिद्धि का अर्थ किसी भी प्रयास का फल है । चाहे वो एक नौकरी पेशा व्यक्ति का महीने के अंत में मिलने वाली तनख्वाह । या किसी साधक का साधना में सफलता । अलग अलग रूप हैं ।
सांसारिक ने कहा धन की यथोचित समृद्धि । ज्ञानी ने कहा आत्म ज्ञान । साधक ने कहा इष्ट की प्राप्ति ।
जब मैंने अपने गुरुदेव से चर्चा की उन्होंने कहा सिद्धि कुछ नहीं है बस पड़ाव है किसी भी पथ पे चलने वाले पथिक का । सिद्धि किसी भी साधक को सही पथ पे चलने का मार्ग दर्शन है ।
धन की प्राप्ति : धन क्षणिक है सांसारिक भोग विलास के कार्य आने वाला एवं सुलभता हेतु एक मार्ग । आवश्यक पर परम आवश्यक नहीं ।
आत्म ज्ञान : स्वयं का ज्ञान सबको है । सभी को पता है कि मैं क्या कर सकता हूँ । क्या नहीं कर सकता वो बस भ्रम है । जो नहीं किया जा सका उसके कार्य में कुछ कमी है । अगर मैं शिवांश काली का पुत्र और काली पुत्र भैरव का प्रिय हूँ तो जिस रूप में माँ को प्रेम से बुलाऊंगा या जिस प्रकार माँ को पुजुंगा माँ स्वीकारेगी । यह आत्म विश्वास है दंभ नहीं । माँ के प्रति प्रेम है । जो खाऊंगा माँ को वही भोग लगाऊंगा । माँ वही ग्रहण करेगी । जो कार्य करूँगा माँ उस कार्य में सहयोग करेगी एवं हर संभव विधि से रक्षा करेगी ।
इष्ट की प्राप्ति : हर जीव में माँ का अंश है । माँ कोई भी रूप लेकर सामने आ जाएगी । किस विधि से सामने आएगी क्या बोलेगी क्या कराएगी सब उनकी माया है । किस रूप में आवाज देगी यह समझना साधक का कार्य है । जिस रूप में पूजें क्या वही रूप आएगा बात करने ? माँ को पूजा दस भुज रूप में माँ आई दो भुजी । सब माया है । परम तो बस शून्य है । शून्य का कोई रूप नहीं । रूप है तो फिर अनेक ।
सिद्धि फलित तब जब परमेश्वर का अहसास हमेशा हो । काली पुत्र का संग हमेशा रहे । प्रेम से सरोबार जब क्रोध लोभ मोह के बंधन का अहसास ना हो । हर जीव माँ के रूप में मुस्कुराये ।
अलख आदेश ।।।

सिद्धि का अर्थ - Siddhi ka arth

सिद्धि का अर्थ किसी भी प्रयास का फल है । चाहे वो एक नौकरी पेशा व्यक्ति का महीने के अंत में मिलने वाली तनख्वाह । या किसी साधक का साधना में सफलता । अलग अलग रूप हैं ।
सांसारिक ने कहा धन की यथोचित समृद्धि । ज्ञानी ने कहा आत्म ज्ञान । साधक ने कहा इष्ट की प्राप्ति ।
जब मैंने अपने गुरुदेव से चर्चा की उन्होंने कहा सिद्धि कुछ नहीं है बस पड़ाव है किसी भी पथ पे चलने वाले पथिक का । सिद्धि किसी भी साधक को सही पथ पे चलने का मार्ग दर्शन है ।
धन की प्राप्ति : धन क्षणिक है सांसारिक भोग विलास के कार्य आने वाला एवं सुलभता हेतु एक मार्ग । आवश्यक पर परम आवश्यक नहीं ।
आत्म ज्ञान : स्वयं का ज्ञान सबको है । सभी को पता है कि मैं क्या कर सकता हूँ । क्या नहीं कर सकता वो बस भ्रम है । जो नहीं किया जा सका उसके कार्य में कुछ कमी है । अगर मैं शिवांश काली का पुत्र और काली पुत्र भैरव का प्रिय हूँ तो जिस रूप में माँ को प्रेम से बुलाऊंगा या जिस प्रकार माँ को पुजुंगा माँ स्वीकारेगी । यह आत्म विश्वास है दंभ नहीं । माँ के प्रति प्रेम है । जो खाऊंगा माँ को वही भोग लगाऊंगा । माँ वही ग्रहण करेगी । जो कार्य करूँगा माँ उस कार्य में सहयोग करेगी एवं हर संभव विधि से रक्षा करेगी ।
इष्ट की प्राप्ति : हर जीव में माँ का अंश है । माँ कोई भी रूप लेकर सामने आ जाएगी । किस विधि से सामने आएगी क्या बोलेगी क्या कराएगी सब उनकी माया है । किस रूप में आवाज देगी यह समझना साधक का कार्य है । जिस रूप में पूजें क्या वही रूप आएगा बात करने ? माँ को पूजा दस भुज रूप में माँ आई दो भुजी । सब माया है । परम तो बस शून्य है । शून्य का कोई रूप नहीं । रूप है तो फिर अनेक ।
सिद्धि फलित तब जब परमेश्वर का अहसास हमेशा हो । काली पुत्र का संग हमेशा रहे । प्रेम से सरोबार जब क्रोध लोभ मोह के बंधन का अहसास ना हो । हर जीव माँ के रूप में मुस्कुराये ।
अलख आदेश ।।।

क्षोभ और संसार

क्षोभ शायद मनुष्य जीवन का हिस्सा बन गया है । सांसारिक को संसार में रहने का क्षोभ , मनुष्य को मनुष्य योनि में आने का क्षोभ , सन्यासी को संन्यास में होने का क्षोभ , पुत्र को पिता से क्षोभ , पिता को पुत्र से क्षोभ । जो मिला उससे क्षोभ जो ना मिला उसका क्षोभ ।
हे साधक जो मिला उससे प्रसन्न रहो । जैसे मिला या मिलेगा वह महामाया का प्रसाद है । प्रसाद समझ के ग्रहण करो । प्रसाद हमेशा सर्वोत्तम ही होता है । बहाने न खोजो कि यह ऐसे ख़राब है वो वैसे ख़राब है । शरीर है तो शरीर से प्रेम करो त्याग कर परम बनने की चाह में इस शरीर को निरर्थक ना समझो । मात्रि कष्ट के चरम सीमा से प्राप्त हुए इस शरीर से ही यह ज्ञान, बात करने और सोचने की क्षमता प्राप्त हुई है । महामाया के परम रूप को जानने का अवसर मिला है । तो अब इससे ही घृणा क्यों?
जब तक है प्रेम करो और विदेह बनने का प्रयास करो । जब शरीर से आत्मा का प्रस्थान हो जायेगा तो परम बनने का प्रयास करना । शायद क्षोभ में ही क्षोभ को परिभाषित किया जा सकता है । शायद इसिलिए क्षोभ करने वाले मनुष्य पर मेरा क्षोभ ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/kshobh-aur-sansar
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Wednesday, 21 January 2015

औघड़ वाणी - aughad waani

औघड़ वाणी: क्या आज कल तंत्र और अघोर बस प्रयोगों में समाहित हो गया है? नौकरी नहीं प्रयोग बताओ । मन नहीं लगता प्रयोग बताओ । घर में पति पत्नी में अनबन है प्रयोग बताओ । आज कल हर प्रयोग के लिए प्रयोग बन गए । कभी लगता है तंत्र आत्म ज्ञान स्वः अनुभूति से कहीं दूर है । जब सांसारिक भटक गया तो कई भटकाव दीक्षा वाले गुरु भी अवतारित हो गए । ऐसे अनेक गुरु रूपी गुरु घंटाल हर नुक्कड़ पर बैठ गए जो घंटो में प्रेमी या प्रेमिका को वापस लाने का दावा करने लगे । और कामांध सांसारिक मृत अवश्यम्भावी देह को पाने के लिए विचलित हो गया ।
कुछ महानुभावों ने गुरु धर्म का फायदा उठाया । दीक्षा दूंगा इतने पैसे दो । आय का दशांश दो । घर की परेशानी, अनबन दूर कर दूंगा । रक्षा करूँगा । बस धन देते जाओ ।
एक ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने नौकरी छूटे व्यक्ति से 50,000 की मांग रख दी । पैसे लाओ नौकरी दिलवा दूंगा । नौकरी तो नहीं मिली अपितु जिनसे पैसे मांग के दिए थे वो मांगने लगे ।
ऐसे भटकाव वाले दीक्षा गुरु खुद मसान नहीं जाते पर अपने शिष्यों को मसान साधना सिखाते हैं ।
क्या सांसारिक इतना कामांध और मानसिक रूप से कमजोर है कि जहाँ तिलक और वस्त्र के रंग देख लिया दौड़ पडे ?
और ऐसे तथाकथित गुरु भी हर मौके पर देव और देवियों को बदनाम करने लगे । इसका दोष उसका दोष दिखाने लगे । और सांसारिक सब कुछ यथाशीघ्र पाने की आपाधापी और सारे काम तुरंत कराने के चक्कर में और परेशान होने लगे ।
जब संत कौन है गुरु का भाव कैसा होता है सभी को पता है तो ऐसा कार्य क्यों?
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-waani7/

अघोर पंथ- Aghor panth

अघोर पंथ की परिभाषा ही घोर से घोरतर और घोरतर होकर भी अघोर ।।।
अघोर पंथ की साधना करने एवं दीक्षा हेतु एक साधक को अनेक बातों का ध्यान रखना होता है ।
पर मुख्यतः एक साधक के अंदर निम्लिखित गुणों का होना आवश्यक है ।
1. साधक को निर्भय और निडर होना होता है । अघोर पंथ की साधना में विपरीत अनुभुतियों का भण्डार है । एक अघोर साधक वीर मार्गी साधना में अग्रसर होता है । अतः इस साधना में उग्र परीक्षा होती है । साधक के समक्ष अति दुष्कर परिस्थिति का भान होने लगता है । साधना स्थल पर विभिन्न शक्तियों का आगमन होता है । अगर साधक निडर ना हो और प्रेत या पिशाच के द्वारा निकाली गयी आवाजों या दृश्य से भाग खड़ा हो तो नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।
2. साधक सम भाव से रहे । अघोर साधक को कष्ट दुःख दर्द प्रसन्नता एवं सुख में सम भाव से रहना आना चाहिए । अक्सर देखा जताभई कि एक साधक जब परिस्थितियां विपरीत हो तब ज्यादा साधना करते हैं और जब प्रसन्न तो साधना भूल जाते हैं । साधना हर समय चलते रहना चाहिए । दुःख हुआ तो क्रोध करने लगे प्रसन्न हुए तो सबको आशीर्वाद देने लगे । जब सारी परिस्थिति में सम भाव से रहें तो साधना में सफलता मिलती है । भाव इष्ट एवं गुरु का होना चाहिए । उस भाव में भी सम रहने का प्रयास होना चाहिए ।
3. घृणा इर्ष्या द्वेष मोह माया आसक्ति एवं क्रोध से यथा शक्ति दूर होना चाहिए । जब किसी की सफलता या उपलब्धि हो तो इर्ष्या का या द्वेष का भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए । किसी भी वस्तु व्यक्ति या जीव से किसी भी रूप में घृणा नहीं करनी चाहिए । मल मूत्र गन्दगी से साधना में विघ्न होगा यह बस मन के भाव हैं । इन सब भाव को त्यागना होता है ।
4. परम सत्ता का दर्शन हर जीव वस्तु एवं पदार्थ में होना चाहिए । यह संसार महामाया का बनाया हुआ है । हर जीव वस्तु एवं पदार्थ में महामाया के अंश का दर्शन होना चाहिए ।
5. ज्ञान गंगा को समेटने की शक्ति । ज्ञान गंगा कही से से भी प्रवाहित हो सकती है । जहा से ज्ञान मिले ग्रहण करने की क्षमता पूर्ण रुपेन विकसित होनी चाहिए । कभी एक छोटा बालक या बालिका अति गुह्य बात कह जाते हैं । जाने अनजाने में कोई व्यक्ति कुछ बता जाता है । इन सभी बातों को ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए ।
6. दंभ स्व प्रतिष्ठा से दूर होना चाहिए । मनुष्य शक्तियों के भाव में स्व प्रतिष्ठा पाने का भाव रखते हैं । जो मिला है महामाया का प्रसाद है । मेरा कुछ नहीं । मेरे पास कुछ नहीं । इस भाव के संग जीवन सफल होता है । अन्यथा ईवा और प्रतिष्ठा का भाव या आकांक्षा रखने से क्रोध और इर्ष्या उत्पन्न होती है ।
7. अंतत गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव हमेशा होना चाहिए । गुरु के वाक्य सर्वोपरि होने का भाव होना चाहिए । गुरु से चर्चा अवश्य होनी चाहिए । अपना तथ्य सामने रख कर गुरु से वार्ता बिना अश्रद्धा के करनी चाहिए । गुरु ही सूत्र धार हैं । गुरु ही परम परमात्मा हैं । गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान को आत्मसात करना चाहिए ।
इन सारे मुख्य रुपी आचरण से पात्रता में वृद्धि होती है । और गुरु कृपा एवं इष्ट प्राप्ति होती है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-panth3/

मोह माया एवं इक्षा- Moh maya aur iksha

मोह माया एवं इक्षा तो साधना पथ में भी होता है । साधक की महामाया के दर्शन की वार्ता करने की सम्मुख मात्रि प्रेम पाने की होती है । पारलोकिक शक्तियों को देखने एवं यथार्थ जानने की इक्षा होती है । यह भी तो मोह है । महामाया के माया में कार्य सिद्धि की इक्षा भी तो माया का अंश है ।
पर एक सच्चा साधक बिना इक्षा किये अग्रसर होता है । उच्च कोटि के साधक बिना किसी इक्षा के साधना करते हैं । उनकी साधना करने की इक्षा ऐसी होती है जैसे एक तैराक जिसे बस तैरना अच्छा लगता है । तट पर आकर तैराकी को समाप्त करना नहीं । इस साधना रुपी नदी में डूबते रहें तैरते रहें । सब सुलभ हो जाता है ।
महामाया के दर्शन की इक्षा होती है फिर भी इक्षा को प्रकट किये बिना साधना करते हैं । इस साधना रुपी पथ पर बस चलते रहते हैं । इस पथ पर भ्रमित करने तथा भटकाने हेतु महामाया सिद्धियाँ प्रदान करती रहती है । सिद्ध साधक सिद्धि होने के वावजूद उस सिद्धि का भान नहीं रखते । अघोर सिद्धियों को अपने मुंड में जगह दे देते हैं । अपने पास रखने या उन सिद्धियों से कार्य की अभिलाषा नहीं रखते । शिष्यों तथा निकटतम व्यक्तियों का कल्याण भी करते हैं पर प्रसिद्धि या सेवा की इक्षा नहीं रखते हैं । जब सिद्धि या शक्तियों से कार्य हेतु इक्षा होने लगे तो उसी में रमने की इक्षा होने लगती है ।
अतः जो साधक मोह करके भी मोह ना करें । दर्शन की अभिलाषा हो पर सब माँ की इक्षा और प्रारब्ध पर छोड़ दें । जब माया के संग होकर भी माया का तनिक भान ना हो । महामाया प्रसन्न भाव में शिशु रूप में गोद में उठा कर प्रेम करती है ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/moh-iksha/

श्रद्धा और भक्ति - Shraddha aur bhakti

श्रद्धा किसी और से प्रभावित होकर नहीं की जाती । श्रद्धा भक्ति और विश्वास अपने अनुभव से होता है । कोई साधक अपने गुरु के लिए किसी से भी लड़ जाता है और कोई समझाता है । उसी तरह अगर कोई अपने गुरु के बारे में बताये तो पहले उनसे चर्चा करें । उनकी भक्ति को समझे । उनकी भक्ति से मार्ग दर्शन लें ।
कोई जब मुझसे मेरे गुरुदेव के बारे में कहता है । मेरी प्राथमिकता होती है पहले उनसे संपर्क करो । ज्ञान प्राप्त करो । उनका मुझे शिश्य रूप में स्वीकार करना मेरे लिए महामाया कि कृपा थी । शायद किसी और लिए कोइ और कारन हो सकता है । क्यूंकि साधना पथ पर आप अकेले चलते हैं ।
गुरु पथ का मार्ग दर्शन कर महामाया के सामने खड़ा कर देते हैं । पर दर्शन करना किस रूप में माँ का दर्शन होगा यह स्वयं की श्रद्धा है ।
गुरु कहें हर जीव पदार्थ में शिव हैं महामाया हैं । साधक उनका अनुसरण करे पर हर जीव के आँखों में माँ का दर्शन करे । अपनी अपनी श्रद्दा है । अतः मार्ग दर्शन लें संतों से मिलें । ज्ञान प्राप्त करें । किसी ने गुरु बना लिया आवश्यक नहीं की वो आपके भी गुरु बन जाएँ ।
कुछ सांसारिक कहते हैं इस संत से जुड़े हुए व्यक्तियों में सब उच्य स्थान पर हैं । किसी भी चीज का आभाव नहीं है । क्या संत संगती धन प्राप्ति के लिए की जाती है? कदापि नहीं ।
संत संगती आत्म शुद्धि एवं स्वयं चिंतन के लिए की जाती है । जब आत्मा शुद्ध होगी एवं आत्म क्षमता का आभास होगा तब सारे मार्ग स्वयं दिखेंगे । उत्तीर्णता स्वयं में आत्मसात होगी । कोई मार्ग अवरुद्ध नहीं होगा ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/shraddha-bhakti-vishwas/

Tuesday, 20 January 2015

अघोर पंथ - Aghor panth

मैं अघोर पंथ में आना चाहता हूँ । अघोर विद्या सीखना चाहता हूँ । अघोर पंथ मुझे बहूत अच्छा लगता है । ऐसे प्रश्न अधिकाधिक सुनने को मिलते हैं । अघोर पंथ लिखित रूप तथा सुनने में रोमांचक अवश्य है । पर व्यावहारिक रूप में कठिन है । अघोर पंथ में असरल हो चुके मनुष्य को सरल बनना होता है । व्यसक हो चुके मनुष्य में वापस शिशुत्व भाव को जागृत कराता है । एक मनुष्य जो भेद करना सीखता है उसे भेद रहित बनना सिखाता है ।
इन सब रहस्यों को पलट कर वापस उसी भाव में आना अत्यधिक दुष्कर है । इस मंच का उद्देश्य किसी को अघोर पंथ की दीक्षा देना कदापि नहीं है । ना ही अघोर पंथ में आने का आग्रह करना है ।
जो साधक अघोर पंथ में आना चाहते हैं उनसे निवेदन है पहले अपने अंदर की क्षमता को आंकें । अघोर की जीवन शैली और कठिनाईयों को समझें ।
अघोर सुख सुविधा कष्ट एवं कठिन परिस्थितियों में सम रहता है । ऐसे में सांसारिक अपने घर में ही बिना रौशनी के रह के देखें । बिना भय के साधना करके देखें । जब साधना में भय का स्थान ना हो तब अघोर साधना की ओर अग्रसर हों । अन्यथा साधना में असफ़लता एवं अनुभूतियों का आभाव रहता है । साधक को जब किसी भी वस्तु से या व्यसन से प्रेम हो जाये उससे दूर होकर देखें । घृणा की जगह प्रेम से दूर होकर देखें ।
मसान में विरक्ति का अनुभव करने मसान में बैठ कर देखें । रोमांच के लिए या शीघ्र अनुभूति के लिए अघोर में ना आयें । अघोर पंथ दो धारी तलवार है जिसमे मूठ नहीं है । नग्न हाथों से ही पकड़ना है । चलाने में अगर थोड़ी सी भी चूक हुई तो स्वयं को आहत करना अवश्यम्भावी है । मेरे इस लेखन का उद्देश्य भयभीत करना नहीं है पर जो साधक अघोर के बारे में साहित्य एवं श्रवन कर अघोर में बिना जाने आना चाहते हैं उन्हें अघोर पंथ की वास्तविकता से साक्षात्कार कराने का प्रयास कर रहा हूँ ।
अतः अघोर में आने से पहले इस पंथ की वास्तविकता को समझें । फिर इस पंथ में आने का निर्णय करें ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-panth-3/

श्री आदेश नाथ जी

मेरे गुरुदेव प्रभु श्री आदेश नाथ जी के अनुपम वचन :
सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में एक अच्छी बात थी कि उस समय मनुष्य , देव एवं दानव की वेश भूषा , वार्ता , रहन सहन अलग थी ।
देव सुन्दर स्वच्छ आभूषण युक्त एवं संस्कृत बोलते थे । सभी से प्रेम तथा कृपा करते थे । देव सत्कर्म में लीन रहते थे ।
मनुष्य साधारण क्रियाकलापों को करते और हिंदी बोलते थे । सांसारिक कृत्य कर परमेश्वर की उपासना करते थे ।
दानव गंदे एवं मांस मदिरा पी कर उद्धम मचाते थे । अपशब्द बोलते थे । मनुष्य तथा देवों को परेशान करते थे।
जब कलिकाल का पदार्पण हुआ तब सब एक सम हो गए । सबकी वेश भूषा व्यवहार तथा वार्ता एक सामान हो गयी । अंतर कर पाना मुश्किल हो गया ।
सब एक साथ रहने लगे । देव मनुष्य और दानव के भाव ही इस पृथ्वी पर रह गए ।
पर मनुष्य की बुद्धि जीवित है । देव मनुष्य और दानव में भेद उनके कार्य कलापों से ज्ञात किया जा सकता है । पर व्यवहार तथा भेद जानने के लिए थोडा परिश्रम करना पड़ेगा । भाव तथा क्रिया कलापों से ही जाना जा सकता है कि कौन देव है कौन मनुष्य और कौन दानव ।
जय गुरुदेव ।।। श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश आदेश आदेश ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aadeshnathji-vachan/

औघड़ वाणी- Aughad waani

औघड़ वाणी : मनुष्य किसी साधक में एक अलोकिक प्रकाश देखते हैं । प्रकाश पुंज को खोजते हुए जब प्रकाश पुंज की ओर अग्रसर होते हैं । जब प्रकाश की ओर बढ़ते हैं । तब प्रकाश पुंज तेज होता जाता है संग में उस प्रकाश की ऊष्मा भी तेज होती है । शरीर का तेज एवं ऊष्मा में भी वृद्धि होती है । जब प्रकाश पुंज के निकट होते हैं तब शरीर से भी तेज निकलता है ऊष्मा निकलती है प्रकाश निकलता है । अगर साधक उस समय इस भान में रहे कि तेज, ऊष्मा या प्रकाश उससे प्रवाहित हो रहा है तो भटक जाता है ।
इस बात को भूल जाता है कि प्रकाश परम पुंज से निकल कर उससे मात्र प्रवाहित हो रहा है। कुछ साधक प्रकाश पुंज तक पहुँचने से पहले ही बैठ कर अपने आप को परम समझने लगते हैं ।
अपितु परम तो कुछ और दूरी पर है ।
जो साधक परम तक पंहुचा और परम प्रकाश पुंज में समाहित हो गया वह उसी में लीन हो गया ।
अलख आदेश ।।।

घोर अघोर- Ghor Aghor

अघोर का अर्थ जो घोर हो घोर से भी घोर और उसे भी घोरतर हो पर उस घोर में रह कर भी लीन ना हो । घोर का अर्थ किसी भी रूप में लिया जाये अगर मोह माया का लिया जाये तो महादेव मोह माया के घोर स्वरुप में हैं हर संतान सम है उनके लिए । महादेव की संतान मनुष्य पशु पक्षी दानव दैत्य सब हैं । महादेव को सबसे मोह है। मोह के घोर से भी घोर रूप में महादेव सबसे जुड़े हुए हैं । पर उस परम मोह में रह कर भी महादेव उस मोह से पृथक हैं । मोह होकर भी मोह नहीं है। प्रेम है अत्याधिक प्रेम है पर प्रेम नहीं है।  यही अघोर की परिभाषा है।
अघोर साधक अपने शिष्य से मित्र से मोह का बंधन रखता है । अगर शिष्य के ऊपर कोई विपदा आये गुरु उस विपदा के समक्ष खड़े होते हैं । शिष्य का व्यथा गुरु से बेहतर कौन जाने जब गुरु महामाया से भीगी आँखों से शिष्य के विपदा निवारण हेतु प्रार्थना करते हैं ।
पर ऐसा बंधन होते हुए भी बंधन नहीं होता ।
जब सब कुछ हो फिर भी ना हो । यही अघोर की परिभाषा है ।
अलख आदेश ।।।