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Tuesday, 10 February 2015

आध्यात्म और भेद भाव

                             ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

अघोर में या अध्यात्म में प्रवेश करते ही क्या साधक साधारण मनुष्यों को एवं दुसरे पंथ के साधकों को अज्ञानी और बेवकूफ समझने लगते हैं ?
                                             अगर ऐसा है तो संभल कर अपने वचन और कर्म का चयन करें । आप महामाया की लीला में लील होने की तय्यारी कर रहे हैं ।महाकाल के समीप होने का प्रथम चरण सहजता और निश्छलता है । अगर काम क्रोध लोभ मोह क्षोभ द्वेष और घृणा का छोटा सा अंश भी रह गया तो माया के समुद्र में ऊपर आकर फिर से गोता लगाना होगा और स्वयं को फिर से साध कर बहते रहना होगा । अर्थात फिर से जन्म लेकर वापस इसी चक्र से बचना होगा ।
                                                  कुछ साधक स्वः को इष्ट के नजदीक बताने की गलती करते हैं और साधारण मनुष्य जिसने उनपर पूर्ण श्रद्धा रखी है उनको तरह तरह के प्रपंच से प्रलोभित करते हैं ।विश्वास और अंध विश्वास के मध्य में चलना होता है । जब श्रद्धा पूर्ण हो जाए तो अनर्गल भाव कदापि प्रवेश नहीं करेंगे ।ऐसे प्रपंचों के कारण श्रद्धा अपूर्ण हो गयी है । मनुष्यों को देव -दानव और मानव में भेद समझना आवश्यक है । अन्यथा वही गर्त है ।
अलख आदेश ।।।


भं भं भैरव

                                ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

भं भं भैरव ।।।
जब हो घुंघरू की झुनझुन , सर्प की फुंफकार
क्रोधेश की स्वास की थर्राहट
लगे श्वान हो आस पास ।।
महामाये के संग आये मेरे परमेश्वर,
काँपे हर वस्तु काँपे सारा संसार ।।
भं भं पुकारे मेरा मन मेरा रोम रोम हे नाथों के नाथ
झुकाए सर समक्ष आपके, पड़ा है अनादि नाथ ।।

क्रोधेश महा भूत पति को अलख आदेश ।।

http://aadeshnathji.com/bham-bhairav/

अघोर साधना

                                
                                      ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                             अघोर साधक को कुछ भी पाने के लिए कठिन से कठिन एवं अति उग्र अनुभूतियों से गुजर कर ही कुछ पाना होगा । वीर मार्गी साधना में अनुभूतियाँ भी अति उग्र होती हैं। मस्तिस्क की जागृत अवस्था और अर्ध सुप्तावस्था में द्वन्द होता है । जब तक जागृत मस्तिस्क कार्य करेगा अर्द्ध सुप्त मस्तिस्क (जो साधना के बल पर जागृत होता है ) नहीं जागेगा ।
                                                     कई अनुभूतियों में शरीर का विलीन होना एवं जल में डूबने के समान अनुभूति होती है । शक्तियां अलग अलग रूप से अनुभूति प्रदान करती हैं । जो साधक की साधनाओं का पथ प्रदर्शन करती हैं । किसी को नाग की अनुभूति , सर्प से जकड़ने की अनुभूति , कहीं ऊँचाई से गिरने की अनुभूति । वीर साधना अनेकानेक अनुभूतियों का भण्डार है । पर अनुभूतियों में आवश्यक है जागृत अवस्था को खोने देना । साधक अक्सर उन अनुभूतियों में भय वश जागृत अवस्था में आने के लिए छटपटाने लगते हैं । यह तो बस अर्द्ध सुप्तावस्था है । इन अनुभूतियों के पश्चात ही शक्ति का आगमन है ।
                                                          शुरुआत में भय तो होता ही है । चाहे आप मसान में पहली बार जाओ या किसी शक्ति के आलिंगन में । उस भय को किनारे कर इष्ट एवं गुरु पर पूर्ण विश्वास रख कर कि कुछ नहीं होगा । करवाने और देखने वाले देख रहे हैं सब उन पर छोड़ कर आगे बढ़ना ही साधना में उन्नति का मार्ग प्रशस्त करना है ।
                                                           पर कुछ साधक इन परीक्षाओं से बिना गुजरे सब कुछ पाना चाहते हैं । पिछली पोस्ट के बाद एक महानुभाव ने कहा ,” मुझे कलवा चाहिए ।”

क्या शक्तियां ऐसे ही मिल जाती हैं ?? क्या कलवा कोई हलवा है जो उठाया और दे दिया ??

                                                    किसी भी शक्ति को धारण करने से पूर्व साधक को सक्षम होना होता है । अगर साधक सक्षम ना हुआ तो शक्ति साधक का अनिष्ट कर चली जायेगी । अगर जलता हुआ अंगार हाथों पे उठाना है तो हाथ को लौह का बनना होगा ।सर्वोपरि है गुरु मन्त्र जो आपको सक्षम बनाता है । उसके उपरान्त साधनाएं शुरू होती हैं ।अन्यथा किसी भी साधना की शुरुआत हानि कारक है ।
                                                       साधना करें और किसी भी शक्ति को पानी की लालसा ह्रदय में कदापि ना रखें । जब शक्तियों को आपकी क्षमता का दर्शन होगा और स्वार्थ रहित विचार एवं साधना होगी तो शक्तियों का साथ निरंतर एवं हर क्षण रहेगा ।
अलख आदेश ।।

Monday, 9 February 2015

औघड़ वाणी

                                      ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                          
                                               औघड़ वाणी : अघोर की आकांक्षा रखे साधक का भटकाव होना अवश्यम्भावी है । जब तक भटकाव नहीं होगा तब तक महामाया की माया समझ नहीं आएगी । भटको अवश्य भटको पर भटकने के बाद अपने गंतव्य को समझने का प्रयास करो । भटकाव को समझने के लिए आवशक है ग्रहण मुद्रा । शक्ति को पाने के बाद उसी में रमने और प्रदर्शन से पहले आवश्यक है ग्रहण मुद्रा को समक्ष रखना । अगर ग्रहण मुद्रा में ना रहे तो स्वः प्राथमिकता ले लेगा ।
                                             अक्सर नए साधको को देखता हूँ अघोर में आये और स्वयं को अघोरी और औघड़ बताने लगे । अघोरी और औघड़ की परिभाषा कहीं ऊँची है । कुछ कहते हैं मुझे भय नहीं लगता कहीं भी बिठा दो । दंभ भाव में जब उनको अघोरानुभुती होती है तो फिर गुरु पर सवाल उठाने लगते है ।
हमारे सदगुरुदेव का वचन है जो गुरु कहे वो करो जो करे वो कदापि ना करो । उनकी शक्ति और सामर्थ्य कहीं ऊँचा है । उनकी एक ताली से मसान भयंकर रूप लेकर समक्ष आ जाता है ।

                                                  और जब नए साधक अपने आपको समर्थ समझ मसान को गुरु के ही तरह से जगाने का प्रयास करते हैं तब कुछ हासिल नहीं होता है । अगर कोई उन्हें कुछ बताये तो स्वः को समर्थ समझ उनसे भिड जाते हैं ।गुरु पराकाष्ठा पर विराजित होकर भी जब सीखने का मौका मिलता है सीखने का प्रयास करते हैं ।  तो उनके इसी भाव को समक्ष रख कर इसी भाव से ग्रहण मुद्रा को प्राथमिकता दें । जीवन और शरीर नश्वर है । आत्मा इसी ज्ञान और स्वः को समझ कर शिव के समक्ष जाती है और त्रुटी होने पर वापस जन्म लेती है ।
अलख आदेश ।।।




औघड़ वाणी

ॐ सत नमो आदेश श्रीनाथजी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश

                                              औघड़ वाणी : अघोर पंथ की वास्तविकता से परिचय कराना गुरु का कार्य है । गुरु हर संभव जटिलताओं से साधक का परिचय कराते हैं । नए साधकों के प्रश्न जिसमे मैं अघोर मार्ग के कठिन स्वरुप को भयभीत करने के उद्देश्य से लिख रहा हूँ ऐसा कतई नहीं है । मैं तो गुरु आज्ञा से अघोर पंथ के वास्तविक रूप को सभी के सामने रख रहा हूँ । इससे भयभीत होना या प्रेम होना आपका दायित्व है ।
                                              आपकी इक्षा पर पुर्णतः निर्भर करता है । अघोर सहज है और मनुष्य जीवन काल को समाप्त करता हुआ जटिलता की और बढ़ता रहता है । जटिलता से वापस सहजता की ओर अग्रसर होना अत्यधिक कठिन है ।
                                              अघोर में भय का कोई स्थान नहीं है । अगर भयभीत हुए तो कुछ समय की और प्रतीक्षा कर लें । अक्सर देखा गया है । अभी कुछ देखा या सुना या पढ़ा मन लालायित हो जाता है उस कार्य को करने के लिए । ऐसा अघोर पंथ में प्रवेश हेतु कतई ना करें । पढ़ते रहें समझते रहें एवं अघोर को जानते रहें । जब स्वः गुरु आत्मा का आदेश हो जाये कि अघोर पूर्णतः आपके लिए ही है तब प्रवेश लें या अघोर साधनाओं की ओर अग्रसर हों ।

अलख आदेश ।।।


http://aadeshnathji.com/aughad-waani-14/ 

Wednesday, 28 January 2015

क्षोभ और संसार

क्षोभ शायद मनुष्य जीवन का हिस्सा बन गया है । सांसारिक को संसार में रहने का क्षोभ , मनुष्य को मनुष्य योनि में आने का क्षोभ , सन्यासी को संन्यास में होने का क्षोभ , पुत्र को पिता से क्षोभ , पिता को पुत्र से क्षोभ । जो मिला उससे क्षोभ जो ना मिला उसका क्षोभ ।
हे साधक जो मिला उससे प्रसन्न रहो । जैसे मिला या मिलेगा वह महामाया का प्रसाद है । प्रसाद समझ के ग्रहण करो । प्रसाद हमेशा सर्वोत्तम ही होता है । बहाने न खोजो कि यह ऐसे ख़राब है वो वैसे ख़राब है । शरीर है तो शरीर से प्रेम करो त्याग कर परम बनने की चाह में इस शरीर को निरर्थक ना समझो । मात्रि कष्ट के चरम सीमा से प्राप्त हुए इस शरीर से ही यह ज्ञान, बात करने और सोचने की क्षमता प्राप्त हुई है । महामाया के परम रूप को जानने का अवसर मिला है । तो अब इससे ही घृणा क्यों?
जब तक है प्रेम करो और विदेह बनने का प्रयास करो । जब शरीर से आत्मा का प्रस्थान हो जायेगा तो परम बनने का प्रयास करना । शायद क्षोभ में ही क्षोभ को परिभाषित किया जा सकता है । शायद इसिलिए क्षोभ करने वाले मनुष्य पर मेरा क्षोभ ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/kshobh-aur-sansar
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Wednesday, 21 January 2015

औघड़ वाणी- Aughad waani

भूत वर्तमान और भविष्य जीवन के स्तम्भ हैं । पर वर्तमान है कहाँ? अभी जो पढ़ा या किया वो भूत में चला गया और जो पढने वाले हो वो भविष्य है । पग बढाया वो भूत जो बढाने वाले हो भविष्य ।
वर्तमान का सन्दर्भ किस तथ्य पर सुशोभित होता है ।
वर्तमान शायद एक त्रिकोण के उस जोड़ के सामान है जो बिंदु से भी छोटा है । एक रेखा भविष्य है एक भूत । जो व्यक्ति उस वर्तमान में स्थिर हो गया वो कभी बदला ही नहीं । ऐसी अपेक्षा बस एक साधक से की जा सकती है जो परम हो गया ।
ना भूतकाल उसे अपने में समाहित कर पायेगा ना ही भविष्य की चिंता उसे परेशान कर पायेगी ।
जिसके शरीर को कभी क्षति नहीं पहुचेगी ना ही उसका मन कभी विचलित होगा ।
शायद परम परमात्मा उस वर्तमान रुपी अति सूक्ष्म जोड़ पर विराजमान हो भूत और भविष्य को नियोजित रूप से चला रहे हैं । एक साधक की परम गति तब होगी जब वह भी उस वर्तमान रुपी जोड़ पर प्रभु से लीन हो जाये ।
साधक का मुख्य कार्य गहन से गहन रूप की व्याख्या समझनी होती है । उत्सुकता और गहन अध्ययन किसी भी रूप की वर्तमान रुपी अति सूक्ष्म जोड़ को समझने की गति प्रदान करता है ।
अन्यथा जो भूत और भविष्य के ऊपर घूमता रहा वो उसी उधेड़बुन में भविष्य रुपी काल और भूत रुपी गत में फस गया ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-waani-8/

औघड़ वाणी - aughad waani

औघड़ वाणी: क्या आज कल तंत्र और अघोर बस प्रयोगों में समाहित हो गया है? नौकरी नहीं प्रयोग बताओ । मन नहीं लगता प्रयोग बताओ । घर में पति पत्नी में अनबन है प्रयोग बताओ । आज कल हर प्रयोग के लिए प्रयोग बन गए । कभी लगता है तंत्र आत्म ज्ञान स्वः अनुभूति से कहीं दूर है । जब सांसारिक भटक गया तो कई भटकाव दीक्षा वाले गुरु भी अवतारित हो गए । ऐसे अनेक गुरु रूपी गुरु घंटाल हर नुक्कड़ पर बैठ गए जो घंटो में प्रेमी या प्रेमिका को वापस लाने का दावा करने लगे । और कामांध सांसारिक मृत अवश्यम्भावी देह को पाने के लिए विचलित हो गया ।
कुछ महानुभावों ने गुरु धर्म का फायदा उठाया । दीक्षा दूंगा इतने पैसे दो । आय का दशांश दो । घर की परेशानी, अनबन दूर कर दूंगा । रक्षा करूँगा । बस धन देते जाओ ।
एक ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने नौकरी छूटे व्यक्ति से 50,000 की मांग रख दी । पैसे लाओ नौकरी दिलवा दूंगा । नौकरी तो नहीं मिली अपितु जिनसे पैसे मांग के दिए थे वो मांगने लगे ।
ऐसे भटकाव वाले दीक्षा गुरु खुद मसान नहीं जाते पर अपने शिष्यों को मसान साधना सिखाते हैं ।
क्या सांसारिक इतना कामांध और मानसिक रूप से कमजोर है कि जहाँ तिलक और वस्त्र के रंग देख लिया दौड़ पडे ?
और ऐसे तथाकथित गुरु भी हर मौके पर देव और देवियों को बदनाम करने लगे । इसका दोष उसका दोष दिखाने लगे । और सांसारिक सब कुछ यथाशीघ्र पाने की आपाधापी और सारे काम तुरंत कराने के चक्कर में और परेशान होने लगे ।
जब संत कौन है गुरु का भाव कैसा होता है सभी को पता है तो ऐसा कार्य क्यों?
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-waani7/

औघड़ वाणी - Aughad waani

औघड़ वाणी : इक साधक का जीवन अति कठिन होता है । वाणी , रहन सहन , भाव – भंगिमा , जीवन शैली आदर्शों के एक पतली सी रस्सी पर चलने के समान होता है । इसी पर चलते जाना है जब तक स्वयं महामाया अपनी गोद में ना उठा ले । जब तक स्व से परम ना बन जाएँ ।
अन्यथा थोड़ी सी भी चूक बदनामी के अँधेरी घाटी में गिरा देता है । ऐसा बस साधक के संग नहीं होता अपितु वह अपने आराध्य एवं पंथ की छवि को भी ठेस पहुचाता है । तथा श्रद्धा रखने वाले शिष्य एवं मनुष्य की श्रद्धा को भी हानि पहुचाता है । अतः साधना पथ पर उन्नति प्राप्त कर चुके साधक की वाणी और कर्म सम भाव में ना हों तो उसके संग इष्ट , मनुष्य की श्रद्धा एवं भक्ति भी हानि सहन करती है ।
अलख आदेश ।।।
http://aadeshnathji.com/aughad-waani5/

Tuesday, 20 January 2015

श्री आदेश नाथ जी

मेरे गुरुदेव प्रभु श्री आदेश नाथ जी के अनुपम वचन :
सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में एक अच्छी बात थी कि उस समय मनुष्य , देव एवं दानव की वेश भूषा , वार्ता , रहन सहन अलग थी ।
देव सुन्दर स्वच्छ आभूषण युक्त एवं संस्कृत बोलते थे । सभी से प्रेम तथा कृपा करते थे । देव सत्कर्म में लीन रहते थे ।
मनुष्य साधारण क्रियाकलापों को करते और हिंदी बोलते थे । सांसारिक कृत्य कर परमेश्वर की उपासना करते थे ।
दानव गंदे एवं मांस मदिरा पी कर उद्धम मचाते थे । अपशब्द बोलते थे । मनुष्य तथा देवों को परेशान करते थे।
जब कलिकाल का पदार्पण हुआ तब सब एक सम हो गए । सबकी वेश भूषा व्यवहार तथा वार्ता एक सामान हो गयी । अंतर कर पाना मुश्किल हो गया ।
सब एक साथ रहने लगे । देव मनुष्य और दानव के भाव ही इस पृथ्वी पर रह गए ।
पर मनुष्य की बुद्धि जीवित है । देव मनुष्य और दानव में भेद उनके कार्य कलापों से ज्ञात किया जा सकता है । पर व्यवहार तथा भेद जानने के लिए थोडा परिश्रम करना पड़ेगा । भाव तथा क्रिया कलापों से ही जाना जा सकता है कि कौन देव है कौन मनुष्य और कौन दानव ।
जय गुरुदेव ।।। श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश आदेश आदेश ।।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aadeshnathji-vachan/

औघड़ वाणी- Aughad waani

औघड़ वाणी : मनुष्य किसी साधक में एक अलोकिक प्रकाश देखते हैं । प्रकाश पुंज को खोजते हुए जब प्रकाश पुंज की ओर अग्रसर होते हैं । जब प्रकाश की ओर बढ़ते हैं । तब प्रकाश पुंज तेज होता जाता है संग में उस प्रकाश की ऊष्मा भी तेज होती है । शरीर का तेज एवं ऊष्मा में भी वृद्धि होती है । जब प्रकाश पुंज के निकट होते हैं तब शरीर से भी तेज निकलता है ऊष्मा निकलती है प्रकाश निकलता है । अगर साधक उस समय इस भान में रहे कि तेज, ऊष्मा या प्रकाश उससे प्रवाहित हो रहा है तो भटक जाता है ।
इस बात को भूल जाता है कि प्रकाश परम पुंज से निकल कर उससे मात्र प्रवाहित हो रहा है। कुछ साधक प्रकाश पुंज तक पहुँचने से पहले ही बैठ कर अपने आप को परम समझने लगते हैं ।
अपितु परम तो कुछ और दूरी पर है ।
जो साधक परम तक पंहुचा और परम प्रकाश पुंज में समाहित हो गया वह उसी में लीन हो गया ।
अलख आदेश ।।।

औघड़ वाणी - Aughad Waani

औघड़ वाणी: मैं औघड़ हूँ धारा प्रवाह अपशब्द बोल सकता हूँ । मैं माँ की छांव में रहता हूँ कोई मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता है । मसान का मैं बाप हूँ । अपशब्द बोलना नीचा दिखाना ।
यह सारे दंभ की निशानी हैं ।
किसी मनुष्य को अपशब्द बोलने से पहले उसके अंदर के परम तत्व रुपी परमात्मा के अंश को समझो । अपशब्द नहीं निकलेंगे ।
जब एक साधक माँ की छांव में कुकृत्य करता है तो माँ उसे दण्डित करती है । अपनी छांव से बाहर निकाल देती है । जब माँ की छांव रहेगी नहीं तो कोई भी नकारात्मक शक्तियां प्रभाव डाल सकती हैं ।
कोई किसी से कम ज्ञानी नहीं होता । बस ज्ञान और सत्य का आयाम पृथक होता है । अतः कोई किसी से नीचा तो कदापि नहीं हो सकता है ।
मसान के अधिपति स्वयं महादेव हैं जहाँ पर भैरव और काली महादेव के संग निवास करते हैं ।
मसान को प्रेम से जागृत किया जाता है । अगर प्रेम के संबोधन से मसान जागे तो मसान के अधिपति का भाव नहीं आना चाहिए ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aurghad-waani3/

श्रृष्टि की रचना- Shrishti ki rachna

श्रृष्टि की रचना का उद्देश्य क्या है यह तो ज्ञात नहीं । पर अगर तर्कानुसार सोचता हूँ तो कभी ऐसा प्रतीत होता है जैसे महाकाल महादेव एक ऐसे मनुष्य जिन्होंने परम अवस्था को सर्वप्रथम प्राप्त कर लिया । परम अवस्था को प्राप्त देव स्वरूपी परब्रम्ह हो गए समयानुसार दर्शन दे कर सबको ज्ञान और भक्ति का मार्ग दर्शन दिया ।
कभी लगता है कि हम सब महामाया और महादेव के क्रीडा स्थल पर खेल रहे हैं । जैसे umpier के हाथ ने points देने की क्षमता हो । बस उनका खेल हम खेलें और जिसका खेल उत्तम लगा उसे points मिल गए । नियम भी उन्ही के खेल भी उन्ही का कानून भी उन्ही के । हम खेल में तल्लीन हो खेले जा रहे हैं ।
सब कुछ महामाया के हाथ में कैसे है यह तो स्वयं किसी भी कार्य में समझ सकते हैं । आप कोई भी कार्य करें पर अंत में क्या फल होगा यह भी नहीं पता होता । क्या पता काम ही ना बने । क्या पता काम रुक जाये और क्या पता सोची समझी हुई कार्य प्रणाली काम ही ना करे ।
पर जहाँ तक मुझे लगता है भगवान् का एक रूप हमारे अंदर भी है । जिसे जागृत करने से अपनी इक्षा के अनुसार कार्य किया जा सकता है । जब स्वयं का ब्रम्ह जागृत हो जाये तो महामाया भी उस कार्य में बाधा नहीं उत्पन्न कर पाती है । अन्यथा रावन सबसे महान था । उसे भूत भविष्य और वर्तमान ज्ञात था तो दंभ क्यों करता और मृत्यु को प्राप्त करता । शास्त्रों में भी कहा गया है स्वयं के ब्रम्ह को जागृत करो ।
इसिलए शास्त्रों में स्वयं को जागृत करने और नियंत्रित करने की बात कही गयी है । कार्य करो पर स्वयं को ब्रम्ह बना कर साधारण मनुष्य की तरह ही रहो । विदेह होने की उत्तम प्रणाली है ।
अलख ।।।

http://aadeshnathji.com/srishti/

अघोर / Aghor

क्या अघोर पंथ खतरों से भरा हुआ है?
हाँ अघोर पंथ खतरों तथा अप्राकृतिक अनुभूतियों से भरा हुआ है ।  इस पंथ के साधक अक्सर विपरीत बुद्धि के होते हैं । जब मन में आया माँ को प्रेम किया कभी बेताली बोल दिया कभी पिशाचिनी बोल दिया । पर प्रेम ह्रदय से करते हैं । ना कोई छल ना कपट ना ही कोई इर्ष्य रखते हैं ।  साधारणतः साधक की इक्षा होती है माँ सौम्य रूप में दर्शन दे । पर अघोर पंथ के साधक माँ को प्रचंड रूप में ध्यान करते हैं । प्रचंड रूप की साधना में प्रचंड अनुभूति एवं अद्भुत विपरीत अनुभूति होती है ।
अघोर पंथ के साधक महामाया तथा महाकाल में रमे हुए होते हैं ।
अघोर पंथ की परीक्षा भी कठिन होती है । जो साधक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ वो सब कुछ पाया अन्यथा सब कुछ त्याग कर भूल गया ।
अघोर उन साधकों के लिए कदापि नहीं है जो भय में साधना करते हैं । भैरव की साधना करते समय भय दूर करने के लिए हनुमान जी की फोटो जेब में रखते हैं कि अगर कोई भूत प्रेत आया तो हनुमान जी रक्षा करेंगे ।
रक्षा तो अवश्य होगी पर प्रेत राज क्रोधेश स्वयं रक्षा कर लेंगे । कुछ पाना है तो कुछ परेशानियों से गुजरना भी पड़ेगा ।
आग का दरिया है डूब के जाना है।
इस दरिया में डूबना तो है बस डूब जाना है। उस पार वही लगायेंगे । अगर खुद कोशिश की निकलने की तो प्रभु बैठ कर मुस्कुराएंगे  ।
अलख आदेश ।।।

http://aadeshnathji.com/aghor-anubhuti/